कृषि कानून वापस अब आगे क्या…?


हाल ही में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि कानून वापस करने की घोषणा की थी। जिसकी आज कागजी कार्रवाई समाप्त हुई व कृषि कानून पूर्ण रूप से वापस ले लिए गए। कृषि कानून तो वापस तो हो गए लेकिन क्या इससे किसानों की स्थिति सुधर जाएगी। किसान जहां थे अब फिर से वही आ खड़े हुए हैं। लगातार महंगाई के दौर में कृषि उपकरण, खाद, उर्वरको, बीज, मजदूरी, ट्रांसपोर्ट इत्यादि में के दामो में वृद्धि हो रही है। व किसानों के आमदनी में लागत की तुलना में कमी देखी जा रही है। ऐसे सरकार के सामने किसानों की आय में वृद्धि करने की चुनौती बरकरार बनी हुई। किसान अब भी धरना स्थल पर डटे हुए हैं। किसान अब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून पर अड़े हुए हैं।
मोदी सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने का बिल दोनों सदनों में पारित कर दिया है, लेकिन पिछले एक साल से धरने पर बैठे किसान इन क़ानूनों के वापसी के साथ-साथ, लगातार एक मांग करते आएं हैं कि उन्हें उनकी फसलों पर एमएसपी की गारंटी दी जाए।

न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या है….?

न्यूनतम समर्थन मूल्य  जिसे MSP के नाम से भी जाना जाता है। MSP का फूल फार्म मिनिमम सपोर्ट प्राइस जिसमे किसानों की 23 फसलों के लिए निर्धारित किया जाता है।
 लागत और मूल्य आयोग’ द्वारा सरकार को 22 अधिदिष्ट फसलों (Mandated Crops) के लिये ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) तथा गन्ने के लिये ‘उचित और लाभकारी मूल्य’ (FRP) की सिफारिश की जाती है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का एक संलग्न कार्यालय  सुझाव देता है।

किस-किस फसल पर एमएसपी मिलता है?

इसमें 7 अनाज वाली फसलें हैं- धान, गेहूं, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ।

5 दालें – चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर।

7 ऑयलसीड – मूंग, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी, तिल, नाइजर या काला तिल, कुसुम।

4 अन्य फसल – गन्ना, कपास, जूट, नारियल।

इसके अलावा लाही और नारियल के न्यूनतम समर्थन मूल्यों (MSPs) का निर्धारण क्रमशः सरसों और सूखे नारियल के न्यूनतम समर्थन मूल्यों (MSPs) के आधार पर किया जाता है।

मोदी सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने का बिल दोनों सदनों में पारित कर दिया है, लेकिन पिछले एक साल से धरने पर बैठे किसान इन क़ानूनों के वापसी के साथ-साथ, लगातार एक मांग करते आएं हैं कि उन्हें उनकी फसलों पर एमएसपी की गारंटी दी जाए।

पहला सवाल कि एमएसपी क्या है और इसकी क्या ज़रूरत है?

किसानों के हित के लिए एमएसपी की व्यवस्था सालों से चल रही है। केंद्र सरकार फसलों की एक न्यूनतम कीमत तय करती है. इसे ही एमएसपी कहते है। मान लीजिए अगर कभी फसलों की क़ीमत बाज़ार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार इस एमएसपी पर ही किसानों से फसल ख़रीदती है ताकि किसानों को नुक़सान से बचाया जा सके। 60 के दशक में सरकार ने अन्न की कमी से बचाने के लिए सबसे पहले गेहूं पर एमएसपी शुरू की ताकि सरकार किसानों से गेहूं खरीद कर अपनी पीडीएस योजना के तहत ग़रीबों को बांट सके।

एमएसपी को लेकर किसानों में डर क्या है?
वैसे तो एमएसपी तय होती है इस आधार पर कि किसानों को उनकी लागत का 50 फीसद रिटर्न मिल जाए लेकिन असल में ऐसा होता नहीं।कई जगह तो किसानों को एमएसपी से कम कीमत पर भी फसल बेचनी पड़ती है।और जब इसको लेकर कोई क़ानून ही नहीं है तो फिर किस अदालत में जाकर वह अपना हक़ मांगेंगे।सरकार चाहे तो एमएसपी कभी भी रोक भी सकती है क्योंकि ये सिर्फ एक नीति है कानून नहीं।और यही डर किसानों को हैं।
अब तक एमएसपी का कितना लाभ किसानों को मिलता है?

अगस्त 2014 में बनी शांता कुमार कमेटी के मुताबिक़ 6 फीसद किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिल पाया है. बिहार में एमएसपी से खरीद नहीं की जाती।वहां राज्य सरकार ने प्राइमरी एग्रीकल्चर कॉपरेटिव सोसाइटीज़ यानी पैक्स के गठन किया था जो किसानों से अनाज खरीदती है। लेकिन किसानों की शिकायत है कि वहां पैक्स बहुत कम खरीद करती है, देर से करती है और ज़्यादातर उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बिचौलियों को बेचनी पड़ती है।

एसएसपी को लेकर किसानों की मांग क्या है?

आंदोलन कर रहे किसानों की मांग है कि सरकार एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर फसल ख़रीद को अपराध घोषित करे और एमएसपी पर सरकारी ख़रीद लागू रहे।

साथ ही दूसरी फसलों को भी एमएसपी के दायरे में लाया जाए। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी कह चुके हैं कि एमएसपी की व्यवस्था जारी रहेगी और सरकारी खरीद भी जारी रहेगी। लेकिन किसान संगठन चाहते हैं कि उन्हें ये बात क़ानून बना कर लिखित में दी जाए।

सरकार के लिए एमएसपी कितनी भारी पड़ती है ?

ये जो 23 फसलें हैं ये तो भारत के कृषि उत्पाद का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही हैं। मछली पालन, पशु पालन, सब्जियां, फल वगैरह इनमें शामिल ही नहीं हैं।

अगर इन 23 फसलों के आँकड़ें देखें जाएं तो साल 2019-20 में सभी को मिलाकर 10.78 लाख करोड़ रुपये के बराबर का उत्पादन हुआ।लेकिन ये सारी फसल बेचने के लिए नहीं होती, किसानों के अपने इस्तेमाल के लिए भी होती है,बाज़ार में बिकने के लिए इन सब फसलों का अनुपात भी अलग होता है। जैसे 50 फीसदी रागी का होगा, तो 90 फीसद दालों का होगा, गेहूं 75 फीसदी होगा, तो अगर औसत 75 फीसदी भी मान लें तो ये 8 लाख करोड़ से कुछ ऊपर का उत्पादन होगा।

सवाल ये कि अगर सरकार को किसानों को एमएसपी की गारंटी देनी है तो क्या इतना खर्च सरकार को करना होगा?
इन 23 में से गन्ने को निकाल दीजिए क्योंकि वो पैसा सरकार को नहीं देना पड़ता, वो शुगर मिलें देती हैं. सरकार अपनी एजेंसियों के ज़रिए पहले ही कुछ फसलों को खरीद लेती है। जिसकी कुल कीमत  में 2.7 लाख करोड़ थी।

सरकारी एजेंसियों को बाज़ार की सारी फसल खरीदने की ज़रूरत होती भी नहीं क्योंकि अगर सरकार कुल उत्पादन का एक तिहाई या एक चौथाई भी खरीद ले तो बाज़ार में कीमत अपने आप ऊपर आ जाती है।तो किसान अपनी फसल उस कीमत पर बाहर बेच देते हैं।सरकार जो खरीदती है, उसे भी बेचती है, हालांकि ये सब्सिडी वाली कीमत होती है। लेकिन इस सबको देखें तो सरकार को ये खरीद हर साल डेढ़ लाख करोड़ तक की पड़ती है।

सरकार किस तरह से किसानों को एमएसपी का लाभ दे सकती है?

पहला, सरकार प्राइवेट कंपनियों पर ही इसके लिए दबाव बना सकती है कि वे फसलों को एमएसपी पर खरीदें। जैसा गन्ने के लिए होता है।

दूसरा, सरकार अपनी एजेंसी जैसे भारतीय खाद्य निगम, भारतीय कपास निगम, के ज़रिए एमएसपी पर किसानों से फसल खरीदे।

तीसरा, जितना घाटा हो, वो सरकार किसानों को दे दे। ना वो खुद खरीदे और ना प्राइवेट कंपनियों पर ऐसा करने का दबाव बनाए। जो भी उस वक्त बाज़ार में कीमत है उस पर किसानों को फसल बेचने दे और उसमें एमएसपी और बाज़ार की कीमत में जो अंतर रह जाता है, वो सरकार किसानों को दे दे, जैसे किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएँ चलाई ही जा रही हैं