77 लाख के इनामी माओवादी सुरेंद्र उर्फ कबीर ने बालाघाट में आत्मसमर्पण किया है। वह 13 साल पहले झीरम घाटी नरसंहार में शामिल था। सुरेंद्र अब मध्य प्रदेश की नक्सल आत्मसमर्पण पुनर्वास सह राहत नीति 2023 के तहत सामान्य जीवन जीना चाहता है। उसकी पत्नी साजंती उर्फ क्रांति की 1 अप्रैल 2024 को एक मुठभेड़ में मौत हो गई थी, जिसके बाद वह अपनी बेटी शांति के भविष्य को संवारना चाहता है। शांति वर्तमान में 11वीं कक्षा में पढ़ रही है। सुरेंद्र को नीति पर भरोसा है और वह मिलने वाली राशि से नया जीवन शुरू करना चाहता है।
वर्ष 1857 में भारत की आजादी की पहली चिंगारी भड़कने के साथ ही भोपाल रियासत की सैन्य छावनी सीहोर में भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया था। 6 अगस्त 1857 को रिसालदार वली शाह और कोठ हवलदार महावीर कोठ के नेतृत्व में सैनिकों ने बगावत कर ‘सिपाही बहादुर सरकार’ का गठन किया। क्रांतिकारियों ने सरकारी तंत्र पर कब्जा कर लिया। इसी दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने नवाब सिकंदर बेगम से क्रांतिकारियों का समर्थन करने की अपील की, जिसे बेगम ने अस्वीकार कर दिया। 14 जनवरी 1858 को अंग्रेज जनरल ह्यू रोज की सेना ने सीहोर में 356 क्रांतिकारियों को शहीद कर दिया। वली शाह और महावीर कोठ को 2 फरवरी 1858 को फांसी दी गई।