बुलंद सोच, इंदौर।

इंदौर के लालबाग पैलेस में सौंदर्यीकरण और सुविधाओं के विकास पर 47.59 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि परिसर में स्थित वे चार ऐतिहासिक बावड़ियां उपेक्षा का शिकार हैं, जिनमें वर्षभर जल उपलब्ध रहता है।
पैलेस के भीतरी भाग को संवारने का जिम्मा वर्ल्ड मान्यूमेंट्स फंड और पुरातत्व विभाग उठा रहे हैं, वहीं परिसर के सुंदरीकरण और उसे पर्यटकों के अनुकूल बनाने की जिम्मेदारी पर्यटन निगम निभा रहा है।
इन बावड़ियों का कहना है कि वे केवल बावड़ियां नहीं, बल्कि इतिहास की वे धरोहर हैं, जिनका अस्तित्व इस राजभवन से पहले का है। वे होलकर राजवंश द्वारा बनवाई गई भारतीय और यूरोपीय वास्तुकला की इस अद्भुत संरचना के निर्माण, इसके बिगड़ते सौंदर्य और संवरती सूरत के प्रयासों की साक्ष्य हैं।
देश की आजादी के बाद यह पैलेस पुरातत्व विभाग की धरोहर बन गया। पैलेस की सूरत को संवारने की कोशिशें पुरातत्व विभाग, पर्यटन निगम, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और वर्ल्ड मान्यूमेंट्स फंड द्वारा की जा रही हैं, लेकिन बावड़ियों के संरक्षण की आवश्यकता को दरकिनार कर दिया गया है।
आज तक इन बावड़ियों का जल पैलेस के रखरखाव, बगीचों की सिंचाई और निर्माण कार्य में उपयोग हो रहा है।
एक ओर जहां शहर में अभी तक जरूरत से कम पानी बरसा है और भविष्य में जलसंकट को लेकर शहर के कुएं-बावड़ियों से उम्मीद लगाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर लालबाग पैलेस परिसर की इन बावड़ियों पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है।
परिसर में बगीचे, एम्फीथियेटर, गार्डन कैफे, फव्वारे, साइकिल ट्रैक और वीकली हाट बनाए जा रहे हैं।
पर्यटन निगम का कहना है कि उनके प्रोजेक्ट में बावड़ियां शामिल नहीं हैं, जबकि पुरातत्व विभाग का कहना है कि पूर्व में प्रयास किए गए थे, पर अभी कोई योजना नहीं है।
इन स्थितियों से पूरी योजना पर सवाल उठ रहे हैं।
परिसर की प्रमुख बावड़ियां
लालबाग पैलेस परिसर में चार प्रमुख बावड़ियां हैं, जिनमें चंपा बावड़ी, टैरेस बावड़ी, मजार बावड़ी और मुख्य द्वार की बावड़ी शामिल हैं।
चंपा बावड़ी का निर्माण विक्रम संवत 1893 (ईस्वी सन 1836) में महाराजा यशवंतराव प्रथम के पुत्र मल्हारराव द्वितीय की स्मृति में कराया गया था। यह दो मंजिला बावड़ी है, जिसमें कक्ष भी बने हैं, जहां गर्मी में राजपरिवार के सदस्य समय बिताने आते थे।
टैरेस बावड़ी परिसर में उस स्थान पर बनी है, जहां अब तक मेले आयोजित होते रहे हैं। बावड़ी की मुंडेर अपेक्षाकृत ऊंचाई पर होने के कारण इसे टैरेस बावड़ी कहा जाता है। इसके जल से आज भी पैलेस के बगीचे में सिंचाई होती है।
मजार बावड़ी परिसर में बनी एक मजार के पास स्थित है। करीब दो दशक पहले इस बावड़ी को पर्यटन विभाग ने ढंक दिया था।
मुख्य द्वार की बावड़ी परिसर के प्रवेश द्वार पर है। पैलेस निर्माण के दौरान इसे ढंककर उस पर सुरक्षाकर्मी का कक्ष बना दिया गया था। इसका जल आज भी उपयोग में आता है।
विशेषज्ञों और अधिकारियों की राय
पुरातत्व विभाग के उपसंचालक केएल डाबी ने बताया कि वर्तमान में ये चारों बावड़ियां प्रोजेक्ट में शामिल नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में इनके संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश सांस्कृतिक विभाग को विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेजी गई थी, पर कार्य नहीं हो सका और भविष्य में इस दिशा में फिर प्रयास किया जाएगा।
इतिहासकार प्रकाश परांजपे के अनुसार, लालबाग पैलेस परिसर में बावड़ियों के साथ मगर कुआं भी था। इन सभी में पर्याप्त पानी है और इनका निर्माण पैलेस से पहले हुआ था। उन्होंने बताया कि मगर कुएं से पाइपलाइन डालकर पैलेस की टंकी में पानी भरा जाता था, लेकिन नए सीमांकन के चलते यह कुआं अब सड़क के दूसरी ओर हो गया है, हालांकि यह कभी परिसर का ही हिस्सा हुआ करता था।
भूजल विशेषज्ञ सुधींद्रमोहन शर्मा का कहना है कि लालबाग पैलेस की बावड़ियां रिचार्ज जोन में हैं। यहां सतही जल ज्यादा और जल्दी एकत्र होकर जमीन में समाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इंदौर बेसाल्ट पत्थर पर बसा है और बेसाल्ट के ऊपर क्षरण के कारण बनी मिट्टी की संरचना व क्षरित बेसाल्ट पानी और उसके भंडारण के लिए उपयुक्त होता है।
केंद्र सरकार के एक दल ने इंदौर में ढाई सौ वर्ष पुरानी होलकरकालीन बावड़ी देखी थी।

