ग्वालियर में कम बारिश के कारण गर्मी में जल संकट की आशंका के मद्देनजर, जल संसाधन विभाग ने अपर ककैटो, ककैटो और पेही बांधों से पानी तिघरा बांध में स्थानांतरित करने की कवायद शुरू की है। इस कदम से तिघरा में लगभग दो महीने के अतिरिक्त पानी की व्यवस्था हो सकेगी, जिससे शहर की आगामी पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। हालांकि, बांध को पूरी क्षमता तक भरने के लिए अच्छी बारिश अभी भी आवश्यक है। विभाग जून 2024 जैसी स्थिति से बचने के लिए योजना बना रहा है।
इंदौर के लालबाग पैलेस में 47.59 करोड़ रुपये की लागत से सौंदर्यीकरण और सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। इस कार्य में पुरातत्व विभाग, पर्यटन निगम, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और वर्ल्ड मान्यूमेंट्स फंड शामिल हैं। हालांकि, परिसर में स्थित चार ऐतिहासिक बावड़ियां, जिनमें वर्षभर जल रहता है और जिनका उपयोग पैलेस के रखरखाव व सिंचाई में होता है, उपेक्षित हैं। पर्यटन निगम और पुरातत्व विभाग दोनों ने इनके संरक्षण को अपनी वर्तमान योजना का हिस्सा नहीं बताया है, जिससे पूरी योजना पर सवाल उठ रहे हैं।
इंदौर जिले में कम बारिश के कारण खेतों में जल संकट गहरा गया है। सितंबर माह समाप्त होने को है, लेकिन कई गांवों में तालाब और चेकडैम खाली हैं, और नलकूप भी साथ छोड़ रहे हैं। इससे लहसुन और आलू की बोवनी प्रभावित हो रही है, तथा अक्टूबर में गेहूं और चने की बोवनी को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है। कृषि विभाग कम पानी वाली फसलों के प्रचार-प्रसार के लिए गांवों का दौरा कर रहा है।
इंदौर, जो पिछले आठ वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा प्राप्त है, में सार्वजनिक सुविधाघर बदहाल स्थिति में हैं। नईदुनिया के सर्वेक्षण में सामने आया है कि 90 प्रतिशत से अधिक सुविधाघरों में पानी नहीं है, और कई में यूरिनल तथा वॉश-बेसिन भी गायब हैं। नगर निगम स्वच्छ सर्वेक्षण से पहले विशेष सफाई अभियान चलाता है और 100% अंक प्राप्त करता है, लेकिन सर्वेक्षण टीम के जाने के बाद इन्हें उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। रखरखाव केवल कागजों पर हो रहा है, जिससे गंदगी सड़क पर बहती रहती है और नागरिकों को भारी असुविधा हो रही है। शहर में लगभग 350 सुविधाघर हैं।
जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाना एक साझा सामाजिक दायित्व है, जो भविष्य में पेयजल संकट से बचने के लिए महत्वपूर्ण है। ‘पेयजल का सम्मान और संरक्षण’ अभियान 21 जुलाई से 4 अगस्त तक पूरे देश में चलाया गया, जो ‘जल संचय जनभागीदारी: कैच द रेन-2026’ से जुड़ा है। यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्षा जल संचयन के आह्वान पर आधारित है और इसका उद्देश्य जल संग्रह, भूजल पुनर्भरण और जल स्रोतों के संरक्षण को बढ़ावा देना है। भारत को जनसंख्या वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती जल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों और आधुनिक तकनीकों के समन्वय की आवश्यकता है।
मध्य प्रदेश सरकार ने इस वर्ष कम बारिश की आशंका के मद्देनजर तैयारियां शुरू कर दी हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक माह पूर्व सभी जिलों को जल स्रोतों का आकलन करने और डैशबोर्ड तैयार करने के निर्देश दिए थे। एक माह बीतने के बाद भी 55 में से केवल 31 जिले ही पानी की उपलब्धता का आकलन कर पाए हैं, जबकि 24 जिलों में यह प्रक्रिया अभी जारी है। किसी भी जिले ने अभी तक डैशबोर्ड तैयार नहीं किया है, जिससे पानी की स्थिति स्पष्ट होनी थी। रिपोर्ट 15 अगस्त तक आने की उम्मीद है।
जबलपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश के कारण गहराते पेयजल संकट की समस्या सामने आई है। पहले 70-80 फीट पर मिलने वाला पानी अब 100 फीट पर भी उपलब्ध नहीं है। जिले के 500 से अधिक ग्राम पंचायतों में स्थापित 10 हजार हैंडपंपों में से 3500 से अधिक का जलस्तर 10 से 30 फीट नीचे गिर गया है, जिससे लगभग 40 प्रतिशत हैंडपंप पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। शिकायतें बढ़ने के बावजूद भूजल स्तर में गिरावट के कारण समस्या बनी हुई है, और अमृत जल योजना का शुरू न होना भी संकट को बढ़ा रहा है।
इंदौर में मानसून के 65 दिन बीतने के बाद भी अच्छी बारिश का इंतजार जारी है, जहां अब तक केवल 15 इंच वर्षा दर्ज की गई है, जो पिछले 10 वर्षों में सबसे कम है। इसका असर शहर के जलाशयों और पेयजल पर दिख रहा है। पूरे मध्य प्रदेश में सामान्य से 18% कम बारिश हुई है, जिससे सोयाबीन, धान जैसी फसलों की बढ़त प्रभावित हुई है। राज्य के 55 में से 50 जिले कम वर्षा की श्रेणी में हैं, जबकि देवास एकमात्र अपवाद है।
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आइसर) भोपाल और मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) के विज्ञानियों के एक एआई अध्ययन से खुलासा हुआ है कि भोपाल का बड़ा तालाब वर्ष 2050 के प्री-मानसून सीजन तक 40 से 60 प्रतिशत तक सिकुड़ सकता है। यह शोध रिमोट सेंसिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर 1980 से 2024 तक के आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन चेतावनी देता है कि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से तालाब का जलभराव क्षेत्र 40 प्रतिशत तक घट जाएगा, जिसका सबसे अधिक असर मई-जून में दिखेगा।
भोपाल की जीवनरेखा बड़े तालाब का जलस्तर कमजोर मानसून के कारण अपने पूर्ण स्तर से 7.10 फीट नीचे पहुंच गया है। पिछले वर्ष की तुलना में भोपाल और सीहोर में कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे तालाब में पानी की आवक प्रभावित हुई है। यह स्थिति पुराने भोपाल, संत हिरदाराम नगर और आसपास के क्षेत्रों की तीन लाख से अधिक आबादी को प्रतिदिन पेयजल उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। मौसम विभाग ने अगले पांच दिनों तक प्रदेश में रुक-रुक कर बारिश और कुछ जिलों के लिए ऑरेंज व येलो अलर्ट जारी किया है।