बुलंद सोच, इंदौर।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित रामोला मंदिर के प्रबंधन और पुजारी के अधिकार को लेकर 72 साल से लंबित अपील का मंगलवार को निराकरण कर दिया। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने अपने 62 पेज के फैसले में उज्जैन जिला कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि रामोला मंदिर और उससे जुड़ी सभी चल-अचल संपत्तियों के स्वामी देवता श्रीराम हैं। मंदिर का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रहेगा, जिसमें कलेक्टर सिर्फ प्रबंधक की भूमिका में होंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी निजी समाज या संस्था को पुजारी नियुक्त करने या हटाने का अधिकार नहीं है।
विवाद की शुरुआत
मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद की शुरुआत 19 दिसंबर 1907 की महंत गोपालदास की वसीयत से हुई थी। इस वसीयत में माहेश्वरी समाज के पंचों की प्रबंधन में भूमिका का उल्लेख किया गया था, जिसका रतनदास पक्ष ने विरोध किया। विवाद बढ़ने पर रतनदास के पिता महंत मुरलीदास ने मंदिर को राज्य के संरक्षण में देने का अनुरोध किया। इसके परिणामस्वरूप, 15 अक्टूबर 1930 को औकाफ विभाग (जो अब धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग है) ने मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन अपने अधीन ले लिया।
महंत मुरलीदास की मृत्यु के बाद, रामानंद संप्रदाय के साधुओं ने एक भेख समारोह में रतनदास को उत्तराधिकारी महंत चुना। औकाफ विभाग ने 1948 में उन्हें पुजारी नियुक्त कर मंदिर का प्रभार सौंपा। माहेश्वरी समाज ने रतनदास की नियुक्ति और विवाह के बाद भी पुजारी बने रहने पर आपत्ति जताई थी। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि रामोला मंदिर मठ नहीं है, इसलिए पुजारी के लिए निहंग यानी ब्रह्मचारी होना अनिवार्य नहीं है।
न्यायिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय
रतनदास ने 1954 में मंदिर और संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार मांगते हुए मुकदमा दायर किया था। विचारण न्यायालय ने 1968 में यह दावा खारिज कर दिया। 1993 में हाई कोर्ट ने रतनदास के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे माहेश्वरी समाज ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
दोबारा हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने रतनदास की पुजारी के रूप में नियुक्ति को वैध माना, लेकिन मंदिर की संपत्ति पर उनका या किसी भी समाज का मालिकाना अधिकार नहीं माना। कोर्ट ने दोहराया कि मंदिर की संपत्ति देवता श्रीराम की है और इसका प्रबंधन शासन के पास रहेगा। माहेश्वरी समाज को श्रद्धालु मानते हुए, उनकी दर्शन-पूजा से रोकने की मांग को भी हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।

