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2026-10-17

इंदौर में स्वाइन फ्लू से महिला की मौत, भोपाल में 6 केस; जांच शुरू नहीं

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश के इंदौर में स्वाइन फ्लू (H1N1) संक्रमण से उज्जैन की 60 वर्षीय महिला की मौत हो गई है। बुधवार शाम कोकिलाबेन अस्पताल में 16 दिन के इलाज के बाद महिला की मृत्यु हुई। मेडिकल रिपोर्ट में एच1एन1 संक्रमण की पुष्टि हुई थी, और महिला को कोई अन्य बीमारी नहीं थी।

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भोपाल में भी अब तक छह मरीजों में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हो चुकी है, लेकिन राजधानी में एच1एन1 की जांच अभी शुरू नहीं हो पाई है। गांधी मेडिकल कॉलेज में जांच किट उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों की जांच के लिए किट का इंतजार किया जा रहा है।

गांधी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एचओडी डॉ. दीप्ति चौरसिया के अनुसार, फिलहाल एच1एन1 की जांच नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि जांच के लिए किट आने की सूचना है और किट उपलब्ध होते ही जांच शुरू की जाएगी। इस मामले में सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने कोई चर्चा नहीं की।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में स्वाइन फ्लू यानी एच1एन1 संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जहां अब तक 13 मरीजों में इसकी पुष्टि हुई है। इनमें से चार मरीज इलाज के बाद स्वस्थ होकर अस्पताल से घर लौट चुके हैं, जबकि दो मरीजों का इलाज घर पर चल रहा है और सात संक्रमित मरीज अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं। स्वास्थ्य विभाग इन सभी मरीजों की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा है।

ओपीडी में मरीजों की संख्या और एम्स की जांच नीति

आंकड़ों के अनुसार, जेपी, हमीदिया और एम्स की ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 10 हजार मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें से करीब 50% मरीजों में गले में खराश, खांसी, बुखार, नाक बहना और थकान जैसे लक्षण बताए जा रहे हैं। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन लगभग 6 हजार मरीज वायरल या रेस्पिरेटरी संक्रमण जैसे लक्षणों से पीड़ित हैं।

एम्स भोपाल के अधिकारियों के मुताबिक, अस्पताल में हर मरीज की नियमित जांच नहीं की जा रही है, बल्कि जिन मरीजों में एच1एन1 जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, उनकी स्थिति के आधार पर सैंपल जांच के लिए भेजे जाते हैं। पिछले लगभग एक सप्ताह में ऐसे करीब 10 सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं, हालांकि एम्स की ओर से इनमें किसी मरीज के एच1एन1 पॉजिटिव पाए जाने की सूचना अभी तक नहीं दी गई है।

विशेषज्ञों की राय और बचाव

पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. लोकेंद्र दवे का कहना है कि मौसम में अचानक बदलाव, नमी और ठंडक के कारण वायरल रेस्पिरेटरी बीमारियां बढ़ती हैं, जिनमें एच1एन1 भी एक प्रमुख कारण है। पिछले लगभग तीन महीने से इस तरह के लक्षण वाले मरीज लगातार आ रहे हैं।

डॉ. दवे के अनुसार, अभी मरीजों की संख्या असामान्य या महामारी जैसी स्थिति में नहीं है। उन्होंने बताया कि इंफ्लूएंजा के लगभग 95% मामले स्वतः ठीक हो जाते हैं, और मरीजों को लक्षणों की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में देखा जाता है।

डॉ. दवे के मुताबिक, गंभीर मरीजों की संख्या कम होती है, लेकिन फ्लू से निमोनिया जैसी जटिलता हो सकती है। इसलिए लक्षण बिगड़ने पर इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। ऑक्सीजन की कमी यानी हाइपोक्सिया वाले मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर आईसीयू सपोर्ट की आवश्यकता पड़ सकती है।

डॉक्टरों के अनुसार, कई परिवारों में ऐसा भी देखने को मिल रहा है कि घर के एक सदस्य को गले में खराश, खांसी और बुखार होने के दो-तीन दिन बाद दूसरे सदस्यों में भी इसी तरह के लक्षण शुरू हो जाते हैं। फिलहाल इंफ्लूएंजा ए (एच1एन1), इंफ्लूएंजा बी के साथ एडिनोवायरस और रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस जैसे संक्रमण सक्रिय हो सकते हैं।

इन सभी संक्रमणों के शुरुआती लक्षण काफी हद तक एक जैसे होते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर सामान्य वायरल, फ्लू, एच1एन1 और कोविड में अंतर करना मुश्किल है।

डॉ. दवे ने बताया कि सर्दी-खांसी और बुखार होने पर सीधे मेडिकल स्टोर से दवा लेना उचित नहीं है, बल्कि मरीज को चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। जिन मरीजों को डॉक्टर एंटीवायरल दवा देते हैं, उन्हें उसका पूरा कोर्स करना चाहिए और लक्षण बढ़ने पर तुरंत दोबारा डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।

बीमार व्यक्ति को खुद को आइसोलेट करना, मास्क लगाना, पर्याप्त आराम करना, गुनगुना पानी पीना और तरल पदार्थों का सेवन बढ़ाना चाहिए। हाथों को साबुन-पानी से धोने और बार-बार आंख, नाक और मुंह को छूने से बचने की भी सलाह दी गई है।

डॉ. दवे के अनुसार, एच1एन1 से बचाव के लिए इंफ्लूएंजा वैक्सीन उपलब्ध है, जिसका सुरक्षा प्रभाव लगभग 60 से 70% तक बताया जाता है। हालांकि, इसका असर आने में समय लगता है।

सामान्य मरीजों के बजाय उन लोगों को वैक्सीन की सलाह दी जाती है, जिनमें संक्रमण की जटिलता का खतरा अधिक रहता है। एग एलर्जी वाले लोगों को वैक्सीन से पहले डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।

स्वाइन फ्लू: एक परिचय

स्वाइन फ्लू को एच1एन1 वायरस भी कहते हैं। यह इंफ्लुएंजा के एक नए स्ट्रेन जैसा है, क्योंकि इसके लक्षण भी सामान्य फ्लू जैसे ही होते हैं। स्वाइन फ्लू मूल रूप से सूअरों में होने वाली बीमारी है, जो इंसानों में भी फैल गई।

इंसानों में इसका संक्रमण रेट यानी एक व्यक्ति से दूसरे में फैलने की गति काफी तेज है। इसके एच1एन2 और एच1एन3 वैरिएंट भी हैं, हालांकि इंफ्लुएंजा के ये वैरिएंट इंसानों में उतनी तेजी से नहीं फैलते हैं और इनके मामले भी बहुत कम देखने को मिलते हैं।

स्वाइन फ्लू एक प्रकार की रेस्पिरेटरी डिजीज है, जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है। यह वायरस सूअरों के शरीर में होता है और इंसानों में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से और तेजी से फैलता है।

साल 2009 के करीब स्वाइन फ्लू का डर इस कदर बढ़ गया था कि लोग सूअरों को मारकर जमीन में दफना रहे थे। हालांकि, क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, सूअर का मांस खाने से इंसानों में स्वाइन फ्लू फैलने की संभावना न के बराबर होती है, क्योंकि खाने से पहले इसे अच्छे से पकाया जाता है, जिससे गर्मी से सभी बैक्टीरिया और वायरस खत्म हो जाते हैं।

स्वाइन फ्लू से डर की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह बेहद संक्रामक बीमारी है, जो लार और बलगम के छोटे कणों के जरिए फैलती है।