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ईरान-इज़राइल तनाव: अमेरिकी ठिकाने आसान निशाना, इज़राइल को परमाणु छूट क्यों?

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ईरान-इज़राइल तनाव: अमेरिकी ठिकाने आसान निशाना, इज़राइल को परमाणु छूट क्यों?
ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच शक्ति प्रदर्शन — परमाणु हथियारों और मिसाइल हमलों की पृष्ठभूमि में।

तेहरान बनाम तेल अवीव में ताजा जंग के बीच उठ रहे हैं दो बड़े सवाल — ईरान को अमेरिकी बेस पर हमला करना क्यों लगता है आसान? और अगर इज़राइल के पास गुप्त परमाणु हथियार हो सकते हैं तो ईरान को क्यों रोका जा रहा है?

रिपोर्टर विशेष | 19 जून 2025

मुख्य समाचार:

मध्य पूर्व में युद्ध की आहटें तेज़ हो चुकी हैं। इज़राइल और ईरान के बीच हालिया सैन्य संघर्ष वैश्विक चिंताओं को जन्म दे रहा है। जहां एक ओर ईरान अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बना रहा है, वहीं इज़राइल ने ईरानी परमाणु ठिकानों पर भीषण हमला किया। यह सब उस समय हो रहा है जब परमाणु हथियारों को लेकर पश्चिम की दोहरी नीति पर भी सवाल उठने लगे हैं।


1. ईरान को अमेरिकी बेस क्यों लगते हैं आसान निशाना?

ईरान ने बीते हफ्तों में इराक, सीरिया और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन हमले किए। विश्लेषकों के अनुसार इसके कई कारण हैं:

  • भौगोलिक निकटता: अमेरिकी बेस ईरानी सीमा के करीब हैं, जिससे हमला करना अपेक्षाकृत आसान होता है।
  • सामरिक संकेत: ईरान सीधे इज़राइल पर हमला करने से बच रहा है, जिससे अमेरिका को चेतावनी दी जा सके कि वह इज़राइल को अंधा समर्थन देना बंद करे।
  • रक्षा प्रणाली में अंतर: इज़राइल के पास आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो मिसाइल सिस्टम जैसे हाई-टेक सुरक्षा कवच हैं, जबकि क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकाने ऐसे व्यापक सुरक्षा कवच से वंचित हैं।

2. इज़राइल के गुप्त परमाणु हथियार और ईरान पर पाबंदी क्यों?

इज़राइल की आधिकारिक नीति ‘नेशनल एम्बिग्युटी’ है, जिसका मतलब है वह कभी सार्वजनिक रूप से अपने परमाणु हथियारों को स्वीकार नहीं करता, पर दुनिया जानती है कि इज़राइल के पास 80 से अधिक परमाणु हथियार हैं (स्रोत: SIPRI)। इसके विपरीत:

  • ईरान अब तक यूरेनियम संवर्धन 60% तक कर चुका है, पर हथियार बनाने की सीमा 90% है, जो उसने पार नहीं की है।
  • अमेरिकी और IAEA खुफिया एजेंसियों ने यह माना है कि ईरान अब तक हथियार निर्माण की ओर नहीं बढ़ा है।

फिर भी अमेरिका और पश्चिमी देश ईरान पर ‘शून्य संवर्धन’ की नीति थोप रहे हैं जबकि इज़राइल को इस संदर्भ में कोई रोक नहीं। यह नीति ‘डबल स्टैंडर्ड’ मानी जा रही है।


3. ताज़ा स्थिति (19 जून 2025 तक): किसने क्या किया?

इज़राइल:

  • 13 जून को “ऑपरेशन राइजिंग लायन” की शुरुआत की।
  • इज़राइली फाइटर जेट्स ने ईरानी परमाणु ठिकानों — नतांज, फोर्डो, ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की इमारतों — को निशाना बनाया।
  • इस हमले में कई वैज्ञानिक, IRGC अधिकारी मारे गए।

ईरान:

  • जवाब में ईरान ने 100 से अधिक मिसाइलें और ड्रोन्स इज़राइल की ओर दागे।
  • हाइपरसोनिक हथियार और शहीद ड्रोन्स का उपयोग किया गया।
  • मिसाइलों में से अधिकतर को आयरन डोम ने इंटरसेप्ट कर लिया, पर कुछ इज़राइल के अस्पताल और दक्षिणी क्षेत्रों में गिरे।

अमेरिका:

  • अमेरिका ने अपने नौसेना जहाज खाड़ी क्षेत्र में तैनात किए हैं।
  • ट्रम्प प्रशासन ने कहा है: “ईरान को बिना शर्त आत्मसमर्पण करना होगा, अन्यथा कार्रवाई तैयार है।”
  • अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल नहीं हुआ, पर इज़राइल को ‘तकनीकी सहयोग’ दे रहा है।

4. वैश्विक प्रभाव और प्रतिक्रिया:

  • तेल संकट: युद्ध के चलते तेल की कीमतें 72 डॉलर प्रति बैरल पार कर चुकी हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र: यूएन सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलायी गई है।
  • यूरोपीय यूनियन और चीन: दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर चुके हैं।
  • भारत: भारत ने सभी नागरिकों को ईरान-इज़राइल क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी है।

ईरान रणनीतिक रूप से अमेरिका के ठिकानों पर हमला करना आसान समझता है, जिससे उसे इज़राइल को सीधे टक्कर देने से तेज़ वज़न मिलता है।

अमेरिका की नीति — इज़राइल को न्यूक्लियर हथियार में छूट, और ईरान को रोकने की नुमाइशी तानाशाही — ने चुनौतियों को बढ़ा दिया है।

क्षेत्रीय उथल-पुथल जारी है, और युद्ध समाप्ति की संभावना कॉल्लैट्रल डैमेज, तेल संकट, और महान वैश्विक दबाव के कारण बेहद दूर नजर आती है।

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