बुलंद सोच, मधुबनी।
बिहार के मधुबनी के रहने वाले 20 वर्षीय पीयूष झा ने एक बेहद किफायती और अनोखा अपशिष्ट जल शोधन प्रणाली विकसित की है, जिसके लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा मान्यता और सम्मान प्राप्त हुआ है।
पीयूष का परिवार बेहतर जीवन की तलाश में बिहार के मधुबनी से मुंबई स्थानांतरित हो गया था। मुंबई की झुग्गियों में रहते हुए, उन्होंने चारों ओर गंदा पानी जमा देखा, जिससे डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियाँ फैलती थीं। वह खुद भी बचपन में इन बीमारियों का शिकार हुए थे।
पीयूष के पास वाटर इंजीनियरिंग की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है। उन्होंने अपने एक स्टार्टअप पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी।
कोरोना महामारी के दौरान, पीयूष की माँ ने जैसे-तैसे उनके लिए एक पुराना सेकेंड हैंड लैपटॉप खरीदा, जिससे पीयूष ने शोध शुरू किया और इस प्रणाली को डिजाइन किया।
यह एक विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर प्रणाली है, जो बिना किसी हानिकारक केमिकल डोजिंग के पानी को साफ करती है। आमतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों को पानी साफ करने की पारंपरिक प्रणालियों पर लगभग 20 लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि पीयूष के समाधान ने इस खर्च को घटाकर सिर्फ 5 से 7 लाख रुपये कर दिया है।
भारत में प्रतिदिन निकलने वाले लगभग 1800 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल में से केवल 20 से 30 प्रतिशत का ही शोधन हो पाता है।

