पन्ना में दो मासूम बच्चे सड़क किनारे सपेरा बनकर अपनी जीविका चला रहे हैं। एक बच्चे के सामने टोकरी में काला नाग था, जिसे वह संभाल रहा था, जबकि दूसरा छोटा बच्चा देख रहा था। शिक्षा के अधिकार और सरकारी योजनाओं के बावजूद, गरीब परिवारों के ये बच्चे दो वक्त की रोटी के लिए जान जोखिम में डालकर यह काम कर रहे हैं। यह बाल श्रम और वन्य जीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन भी है। समाजसेवियों ने प्रशासन से इन बच्चों की पहचान कर उन्हें शिक्षा से जोड़ने और परिवारों को वैकल्पिक आजीविका प्रदान करने की मांग की है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने विदिशा में बेतवा नदी पर स्टॉप डैम के खंभों से कूदकर स्कूल जाने वाले बच्चों के मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने मध्य प्रदेश सरकार से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट भी इस मामले का संज्ञान ले चुका था। बच्चों को 15 किलोमीटर की लंबी सड़क यात्रा से बचने के लिए यह जोखिम उठाना पड़ता था। एक वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए हाई स्कूल शुरू किया और अब स्थायी पुल बनाने की तैयारी चल रही है, जबकि तत्काल राहत के तौर पर स्टॉप डैम पर जालियां बिछाई गई हैं।
विदिशा जिले के ककरुआ और आसपास के गांवों के बच्चे बेतवा नदी पर बने स्टाप डैम के पिलरों से जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं। यह रास्ता लगभग चार फीट के अंतराल वाले नौ पिलरों से होकर गुजरता है, जो बारिश में और खतरनाक हो जाता है। हाई कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया है और इसे बच्चों की सुरक्षा व शिक्षा के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय माना है। प्रशासन ने बैरिकेडिंग और चौकीदार तैनात किए हैं, जबकि शिक्षा विभाग ने एक माध्यमिक विद्यालय को हाई स्कूल में उन्नत करने का प्रस्ताव भेजा है। हाई कोर्ट अब सरकार से स्थायी समाधान पर जवाब मांगेगा।