बुलंद सोच, कोलकाता।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संगठन और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी गुटों के बीच विवाद जारी है। चुनाव आयोग आज, 17 सितंबर को दोनों पक्षों की अलग-अलग सुनवाई करेगा। दोनों गुट खुद को पार्टी का वैध प्रतिनिधि बताते हुए अपने-अपने दावे और दस्तावेज आयोग के सामने पहले ही रख चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक नियंत्रण और उसके ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न को लेकर चल रही यह लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुंचती दिख रही है। चुनाव आयोग गुरुवार को नई दिल्ली में ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुटों की अलग-अलग सुनवाई करेगा।
सुनवाई का कार्यक्रम
सूत्रों के अनुसार, ऋतब्रत के नेतृत्व वाला गुट दोपहर तीन बजे चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के सामने पेश होगा। इसके एक घंटे बाद, शाम चार बजे, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट आयोग के सामने अपनी बात रखेगा।
दोनों गुटों की प्रतिक्रिया
टीएमसी के बागी गुट के विधायक संदीपन साहा ने कहा कि वे अपना पक्ष आयोग के सामने रखेंगे और उन्हें उम्मीद है। ममता गुट के एक वरिष्ठ सदस्य ने भी पुष्टि की कि उनके पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को शाम चार बजे पेश होने के लिए बुलाया गया है। ममता गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सभी जरूरी सबूत और दस्तावेज होने के बावजूद मामले में जानबूझकर देरी कर रहा है और इस मुद्दे को लेकर ‘बहुत शोर पैदा करने की कोशिश कर रहा है’।
बंगाल उपचुनावों के लिए सुनवाई का महत्व
दोनों गुटों की लगातार होने वाली यह सुनवाई बुधवार को आयोग में दस्तावेज और कानूनी सामग्री जमा करने के एक दिन बाद हो रही है। यह सुनवाई नंदीग्राम और रेजिनगर में छह अक्तूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने की 16 सितंबर की समयसीमा खत्म होने के कुछ घंटे बाद भी हो रही है। इस समय ने संगठनात्मक नियंत्रण तक सीमित इस विवाद को और महत्वपूर्ण बना दिया है। तत्काल सवाल यह है कि क्या दोनों में से कोई गुट उपचुनाव में ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरेगा या अंतिम फैसला होने तक आयोग इस चिह्न को रोक देगा।
ममता और ऋतब्रत गुटों के दावे
ममता गुट का कहना है कि पार्टी के संविधान के तहत उसकी संगठनात्मक समितियां वैध हैं। वहीं, ऋतब्रत गुट ने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच अपने समर्थन का हवाला देते हुए खुद को वैध टीएमसी बताया है। ऋतब्रत गुट द्वारा इस साल की शुरुआत में अपना पक्ष आयोग के सामने रखने के बाद से चुनाव आयोग दोनों गुटों के दावों की जांच कर रहा है। विवाद ने एक अलग चुनावी रूप भी ले लिया है क्योंकि दोनों गुटों ने दोनों विधानसभा क्षेत्रों के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं। हालांकि, यह सवाल अब भी बना हुआ है कि स्थापित पार्टी की पहचान का इस्तेमाल कौन सा गुट कर सकता है।
नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव का टीएमसी के लिए महत्व
टीएमसी के लिए नंदीग्राम का महत्व खास है, क्योंकि यह सीट 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन का केंद्र रही थी। इस आंदोलन ने टीएमसी को सत्ता तक पहुंचाने में मदद की थी और अंततः 34 साल तक सत्ता में रहे वाम मोर्चे की हार में भी भूमिका निभाई थी। वहीं, रेजिनगर का चुनाव संगठनात्मक विभाजन की तत्काल दूसरी परीक्षा है। दोनों गुट जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में उपचुनाव पहली ऐसी चुनावी जमीन बन सकते हैं, जहां टीएमसी की विरासत पर दोनों गुटों के दावों की एक साथ परीक्षा होगी।
चुनाव आयोग के फैसले के संभावित असर
दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, चुनाव आयोग के विकल्पों का असर इन दोनों उपचुनावों से आगे भी हो सकता है। अगर आयोग किसी एक गुट के दावे को मान्यता देता है, तो दूसरे गुट को अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है। वहीं, यदि तत्काल कोई फैसला नहीं होता है तो मौजूदा चुनाव चिह्न को रोककर दोनों पक्षों को अस्थायी चुनावी पहचान दिए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों गुटों के नेताओं के मुताबिक, महाराष्ट्र में शिवसेना विवाद के दौरान आयोग ने इसी तरह का रास्ता अपनाया था, जब अंतिम फैसला होने तक प्रतिद्वंद्वी गुटों को मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से वंचित किया गया था और उन्हें अलग-अलग पहचान दी गई थी।
विवाद की पिछली सुनवाई
टीएमसी का यह विवाद अब तक कई दौर की दलीलों और सुनवाई से गुजर चुका है। दो जुलाई को ऋतब्रत के नेतृत्व में 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने पेश हुआ था। गुट ने बहुमत का समर्थन होने का दावा करते हुए पार्टी के संगठन और संपत्तियों पर नियंत्रण की मांग की थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से जवाब मांगा और ममता गुट ने असंतुष्ट नेताओं के दावे को खारिज करते हुए अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध बताया। आयोग ने 12 सितंबर को दोनों गुटों की फिर सुनवाई की और 16 सितंबर की समयसीमा से पहले अतिरिक्त सामग्री मांगी थी।
चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी नजरें
अब नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, ऐसे में गुरुवार की सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। आयोग जो भी रास्ता अपनाता है, उससे न सिर्फ नंदीग्राम और रेजिनगर के मतपत्रों पर दिखाई देने वाले चुनाव चिह्न का सवाल तय हो सकता है, बल्कि इस साल के अंत में संभावित निकाय चुनावों से पहले दोनों गुट मतदाताओं के सामने खुद को किस रूप में पेश करेंगे, यह भी प्रभावित होगा। दोनों पक्षों के लिए गुरुवार की सुनवाई केवल पार्टी के चुनाव चिह्न का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ी है कि अगली चुनावी लड़ाई में टीएमसी का नाम और उसकी राजनीतिक विरासत लेकर कौन सा गुट आगे बढ़ेगा।

