बुलंद सोच, विदिशा।

राज्य सरकार ने अब सरकारी रेस्ट हाउसों के दरवाजे आम लोगों के लिए भी खोल दिए हैं। आम नागरिक तय किराया देकर इनमें कमरा बुक करा सकेंगे।
हालांकि, जिले के सरकारी रेस्ट हाउस सरकार की मंशा के अनुरूप नागरिकों को सुविधाएं उपलब्ध कराने की स्थिति में दिखाई नहीं देते हैं।
इनमें कहीं पानी का संकट है, तो कहीं रसोइया की कमी है। कुछ रेस्ट हाउस तो सिर्फ नाम के हैं, जहां वीआईपी भी रुकने से बचते हैं।
पिछले दिनों राज्य सरकार ने इस व्यवस्था को वीआईपी संस्कृति में बदलाव लाने वाला बताते हुए प्रदेश के 267 रेस्ट हाउसों को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया था।
इसके लिए एमपी पीडब्ल्यूडी की वेबसाइट पर बुकिंग की सुविधा भी शुरू कर दी गई है और बड़े पर्यटन स्थल से लेकर जिला और तहसील मुख्यालयों पर स्थित रेस्ट हाउसों के लिए किराया भी निर्धारित कर दिया गया है।
लेकिन सरकार ने रेस्ट हाउसों के व्यवसायीकरण से पहले भवनों की किस्मत से लेकर सुविधाओं तक में कोई बदलाव नहीं किया, जिसके चलते यह सुविधा अभी बड़े शहरों तक ही सिमटती नजर आ रही है।
राज्य सरकार की इस पहल के बाद नवदुनिया ने वेबसाइट में दर्ज जिले के 10 रेस्ट हाउसों में से तीन की व्यवस्थाओं का ग्राउंड रियलिटी चेक किया।
इस पड़ताल में तस्वीर एक जैसी नहीं मिली, कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है, कहीं जर्जर बाथरूम यात्रियों की परेशानी बढ़ा रहे हैं, तो कहीं भोजन के लिए रसोइया तक उपलब्ध नहीं है।
जिसके चलते इन रेस्ट हाउसों में आम लोगों का रुकना मुश्किल नजर आ रहा है।
जिला मुख्यालय रेस्ट हाउस की स्थिति
जिला मुख्यालय पर स्थित रेस्ट हाउस की स्थिति भी अच्छी नहीं है। 75 वर्ष पुराने इस रेस्ट हाउस के भवन को मरम्मत कर चलाया जा रहा है।
सरकार की पहल के बाद इस रेस्ट हाउस में कोई अधिक बदलाव दिखाई नहीं देता। कुल सात में से दो कमरों की दीवारों में दरारें साफ दिखाई देती हैं, जिन्हें छिपाने के लिए दीवारों को प्लास्टिक की पट्टियों से ढका जा रहा है।
रेस्ट हाउस के बीच के गलियारे में बारिश के समय जल भराव हो जाता है और छत भी टपकने लगती है। हाल ही में मरम्मत के बाद थोड़ा सुधार आया है।
यह रेस्ट हाउस स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। यहां रसोइया के दो पद हैं, लेकिन एक स्थाईकर्मी को रसोइया बनाकर काम चलाया जा रहा है।
इस रेस्ट हाउस में अब तक न तो कमरों के किराये की लिस्ट लगी है और न ही भोजन के लिए मेन्यू कार्ड बना है।
अधिकांश समय यह रेस्ट हाउस ट्रांसफर होकर आए अधिकारियों का ठिकाना बनकर रह गया है, यहां वीआईपी जनप्रतिनिधि तक नहीं रुकते हैं।
ग्यारसपुर रेस्ट हाउस में पानी का संकट
ग्यारसपुर का रेस्ट हाउस वर्ष 1940 में ग्वालियर स्टेट के सिंधिया राजघराने द्वारा बनवाया गया था।
ऐतिहासिक इमारतों और पर्यटन महत्व के लिए देशभर में पहचान रखने वाले ग्यारसपुर में आने वाले पर्यटकों के लिए यह रेस्ट हाउस महत्वपूर्ण ठिकाना हो सकता है।
यहां कुल चार कमरे हैं। तीन कमरों में अटैच लेट-बाथ है, जबकि एक कमरे का लेट-बाथ और बाथरूम जर्जर स्थिति में है।
सबसे बड़ी समस्या पानी की है। रेस्ट हाउस का ट्यूबवेल पानी नहीं दे रहा है, और पानी के लिए ग्राम पंचायत की जलापूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है।
नल से एक-दो दिन के अंतराल पर पानी पहुंचता है। जरूरत पड़ने पर कैंपर से पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था बताई गई है।
ऐसे में परिवार के साथ ठहरने वाले यात्रियों के लिए सबसे बुनियादी सुविधा ही अनिश्चित हो जाती है।
उदयपुर रेस्ट हाउस चौकीदार के भरोसे
गंजबासौदा तहसील के अंतर्गत आने वाला ग्राम उदयपुर एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल है, जहां प्राचीन नील कंठेश्वर मंदिर है और देशभर के श्रद्धालु आते हैं।
लेकिन यहां का रेस्ट हाउस बदहाल है। वर्षों पुराने इस रेस्ट हाउस में दो कमरे हैं, लेकिन कोई स्टाफ नहीं है। ये पूरा भवन चौकीदार के भरोसे संचालित होता है।
रेस्ट हाउस तक पहुंचने की सड़क कीचड़ में तब्दील है। बाउंड्रीवाल नहीं होने से आसपास के लोगों ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर लिया है।
रात के समय खुले परिसर में नशेड़ियों का जमावड़ा हो जाता है।
जिले के इस प्रमुख पर्यटन स्थल के रेस्ट हाउस में रसोई घर ही नहीं बना है, जिसके कारण यहां न भोजन की सुविधा शुरू हो पाई और न ही चाय-नाश्ते की। यहां पीने के पानी तक की सुविधा नहीं है।
ग्राम के सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण शर्मा का कहना है कि यदि इस रेस्ट हाउस को बेहतर बनाकर सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाएं, तो बाहर से आए पर्यटक यहां रुकने लगेंगे। अभी उन्हें गंज बासौदा में होटलों में रुकना पड़ता है।
नटेरन रेस्ट हाउस की उपेक्षा
नटेरन तहसील मुख्यालय पर करीब 20 साल पहले बना रेस्ट हाउस उपेक्षा का शिकार है।
यहां स्टाफ के नाम पर दो कर्मचारी हैं, जो दिन और रात में सिर्फ चौकीदार की भूमिका निभाते हैं।
इस रेस्ट हाउस में दो कमरे और एक रसोईघर भी है, लेकिन रसोइया नहीं है। बिजली के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।
कई बार कमरों के बल्ब खराब होने पर उन्हें बदला तक नहीं जाता। कई महीनों से पानी के बोर की मोटर खराब पड़ी है।
यदि यहां रुकना पड़े, तो खाना और पानी भी साथ लाना होगा। पंखे वर्षों पुराने हैं। कमरों में न एसी है और न ही गीजर की व्यवस्था है।
वेबसाइट पर दर्ज रेस्ट हाउस और किराया
एमपी पीडब्ल्यूडी की वेबसाइट पर विदिशा, गुलाबगंज, ग्यारसपुर, शमशाबाद, नटेरन, गंज बासौदा, उदयपुर, भौंरासा, कुरवाई, सिरोंज, लटेरी सहित 10 रेस्ट हाउस दर्ज हैं।
जिला मुख्यालय पर स्थित रेस्ट हाउसों में कमरों का किराया 600 रुपये से बढ़ाकर एक हजार रुपये तय किया गया है।
तहसील मुख्यालयों पर स्थित रेस्ट हाउसों में कमरों का किराया 500 रुपये से बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया गया है।
विभागीय प्रतिक्रिया
लोक निर्माण विभाग, विदिशा के एसडीओ रवि प्रकाश चिढ़ार ने बताया कि रेस्ट हाउस में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि अब नए निर्देश के बाद बजट उपलब्ध होने पर रेस्ट हाउस की अन्य कमियों को दूर करने के पूरे प्रयास किए जाएंगे।

