बुलंद सोच, इंदौर।
भागीरथपुरा दूषित पेयजल कांड की आयोग जांच में यह खुलासा हुआ कि नगर निगम में किसी भी कार्य की फाइल कछुए की चाल से आगे बढ़ती है। भागीरथपुरा में गंदा पानी आने और लोगों के बीमार होने की जानकारी जनप्रतिनिधियों को थी, इसके बावजूद फाइल को मंजूरी मिलने में 859 दिन का समय लगा। इस अवधि में फाइल मेयर कार्यालय में 66 दिन और महापौर परिषद कार्यालय में चार माह तक अटकी रही, जबकि बस्ती में लोगों के बीमार होने का सिलसिला जारी था।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
दिसंबर में जब बड़ी संख्या में लोग बीमार होने लगे, तब जनप्रतिनिधियों और अफसरों की नींद खुली, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आयोग की जांच रिपोर्ट में अधिकारियों को दूषित पानी के लिए दोषी माना गया, वहीं जनप्रतिनिधियों को भी क्लीन चिट नहीं दी गई। रिपोर्ट के 112वें पेज पर इसका विशेष उल्लेख किया गया है।
नई लाइन बिछाने के प्रस्ताव में विलंब
भागीरथपुरा में नई लाइन बिछाने के लिए ढाई करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया था, लेकिन इस काम को शुरू होने में दो साल से अधिक का समय लगा। बार-बार टेंडर बुलाने के साथ-साथ अलग-अलग स्तरों पर फाइल मंजूरी के लिए धूल खाती रही।
क्षेत्रीय पार्षद की निष्क्रियता और घोटाले का प्रभाव
क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला ने भी इस मामले में कोई दबाव नहीं बनाया, जबकि उनके पास लगातार लोगों के बीमार होने और पानी दूषित होने की शिकायतें आ रही थीं। शहर में ड्रेनेज लाइन घोटाला सामने आने के दौरान ही भागीरथपुरा की फाइल भी आगे बढ़ी थी। माना जाता है कि उस समय बरती जा रही अतिरिक्त सतर्कता का असर भागीरथपुरा की फाइल पर भी पड़ा, जिसके कारण मंजूरी में और अधिक विलंब हुआ।
आगामी सुनवाई में कार्रवाई की मांग संभव
भागीरथपुरा मामले में अब अगली सुनवाई पर याचिकाकर्ता दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।

