बुलंद सोच, ग्वालियर।

कूनो नेशनल पार्क में चीतों की संख्या की स्थिति संतोषजनक है, किंतु चीता प्रोजेक्ट से जुड़े कर्मचारियों को मिलने वाले चीता भत्ते को लेकर अब प्रश्न खड़े हो गए हैं। कूनो में कार्यरत वनरक्षकों और अधिकारियों को 20 माह से चीता भत्ता प्राप्त नहीं हुआ है, जो लगभग 1500 रुपये प्रति अधिकारी-कर्मचारी दिया जाता था।
इस संबंध में स्टाफ ने अधिकारियों से प्रश्न भी किए, परंतु उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। चीतों की दिन-रात निगरानी में लगे स्टाफ में वर्तमान में असंतोष व्याप्त है।
चीतों की ट्रैकिंग को सर्वोच्च प्राथमिकता का कार्य माना जाता है, जिसमें स्टाफ को सीमित संसाधनों के साथ पूरी ट्रैकिंग करनी होती है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए भी उन्हें लंबे समय से भत्ता नहीं मिला है।
चीतों से संबंधित खर्चों के विषय पर विधानसभा में भी प्रश्न उठ चुके हैं। कांग्रेस पार्टी भी इस मुद्दे पर सरकार को घेर चुकी है।
प्रोजेक्ट की शुरुआत और भत्ता व्यवस्था
कूनो नेशनल पार्क में चीतों को बसाने से पूर्व उनकी निगरानी और बजट आदि की व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी गई थी। चीता ट्रैकिंग के साथ-साथ ‘चीता मित्र’ का कॉन्सेप्ट भी लाया गया था, जिसका उद्देश्य कूनो के आसपास के गांवों के लोगों को चीतों से परिचित कराना और उन्हें चीता मित्र के रूप में सुरक्षा में भागीदार बनाना था।
इसी प्रोजेक्ट की शुरुआत में वन विभाग ने सहयोग के माध्यम से चीता ट्रैकर्स के लिए बाइकों की व्यवस्था भी कराई थी। हालांकि, ये बाइकें सीमित संख्या में ही उपलब्ध हो सकीं, जिससे सभी को न मिलने के कारण उस समय भी असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई थी।
चीता ट्रैकिंग के कार्य को केंद्रित रूप से करने के लिए चीता भत्ते की व्यवस्था भी की गई थी, जिसे आरंभ में प्रदान किया गया। इसके बाद यह भत्ता लंबित होने की स्थिति में आ गया और अब 20 माह का समय बीत चुका है, किंतु इसका भुगतान नहीं किया गया है।
कर्मचारियों का आक्रोश और अधिकारियों की चुप्पी
नाम न बताने की शर्त पर चीता ट्रैकर्स का कहना है कि चीता भत्ते को लेकर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। साथ ही, वे साधन व संसाधनों की कमी से भी जूझ रहे हैं।
चीतों की ट्रैकिंग के लिए उन्हें दिन-रात ड्यूटी करनी पड़ती है, जिसमें डीजल से लेकर अन्य संसाधनों को लेकर भी परेशानी होती है। कर्मचारियों द्वारा यह बात उठाई जाती है, लेकिन अधिकारियों की ओर से कोई सुनवाई नहीं होती है।

