बुलंद सोच, इंदौर।
ज्योतिर्लिंग श्रीमहाकालेश्वर मंदिर उज्जैन और ओंकारेश्वर में हुई हालिया विवाद की घटनाओं ने बड़े तीर्थ स्थलों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तीर्थों में अब केवल भीड़ प्रबंधन ही नहीं, बल्कि व्यवहार प्रबंधन भी आवश्यक हो गया है। मंदिर में पहुंचने से पहले और दर्शन के बाद भी दर्शनार्थी का संपर्क अनेक लोगों से होता है, जिनमें फूल-प्रसाद विक्रेता, पार्किंग कर्मचारी, वाहन चालक, होटल-भोजनालय कर्मी और स्थानीय दुकानदार शामिल हैं। ये सभी उनके तीर्थ अनुभव का हिस्सा होते हैं। ऐसे में विवाद या अनुचित वसूली की शिकायतें केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि ये तीर्थ प्रबंधन की व्यापक कमी को भी दर्शाती हैं।
उज्जैन का श्रीमहाकाल क्षेत्र इसका एक हालिया उदाहरण है, जहां बीते ढाई वर्षों में प्रसाद खरीदने के दबाव, पार्किंग, प्रवेश और दर्शन व्यवस्था को लेकर श्रद्धालुओं तथा सेवा व्यवस्था से जुड़े लोगों के बीच विवाद सामने आए हैं। ओंकारेश्वर में भी शीघ्र और वीआईपी दर्शन के नाम पर अधिक राशि वसूली तथा फर्जी टिकट-रिस्ट बैंड जैसे मामले सामने आ चुके हैं। इन दोनों तीर्थों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन इनसे एक ही सवाल उठता है कि श्रद्धालु से सीधे संपर्क रखने वाले हर वर्ग के लिए सेवा और व्यवहार के मानक कैसे तय हों।
समाधान के मॉडल और पहल
गुजरात के अंबाजी में मंदिर से जुड़े ट्रस्ट सदस्यों, पुजारियों, भोजनालय कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों को चार दिन का सॉफ्ट स्किल प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें संवाद, सेवा शिष्टाचार और आगंतुकों से व्यवहार जैसे विषय शामिल थे। केंद्र सरकार की पर्यटन मित्र-पर्यटन दीदी पहल भी इसी व्यापक सोच पर आधारित है। इसमें ऑटो-टैक्सी चालक, पुलिसकर्मी, दुकानदार, होटल-रेस्तरां कर्मचारी और स्ट्रीट वेंडर सहित पर्यटकों से सीधे संपर्क रखने वाले लोगों को आतिथ्य, स्वच्छता, सुरक्षा और बेहतर व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 2025 में संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश में इस पहल के तहत 1,487 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
ओंकारेश्वर के डिप्टी कलेक्टर एवं मंदिर दर्शन प्रभारी मुकेश काशिव ने बताया कि ओंकारेश्वर मंदिर में दर्शनार्थियों को सुलभ और सुचारू दर्शन के साथ अच्छा व्यवहार मिले, इसके लिए व्यवस्थाओं को पुख्ता किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि श्रद्धालुओं को ठगी से बचाने के लिए भी सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।
व्यवहार प्रबंधन विशेषज्ञ कैप्टन जैसन थामस, इंदौर के अनुसार, अच्छा व्यवहार केवल प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि सेवा के भाव से भी आता है। उन्होंने बताया कि बाहर से आने वाला श्रद्धालु लंबी यात्रा के कारण परेशान हो सकता है, और दुकानदार, वाहन चालक, होटल कर्मचारी व सुरक्षाकर्मी का व्यवहार उसका पूरा तीर्थ अनुभव बदल सकता है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसका एक अच्छा उदाहरण है, जहां सेवा भावना तीर्थ अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
खजराना गणेश मंदिर, इंदौर के मुख्य पुजारी अशोक भट्ट ने कहा कि मंदिर में आने वाला हर श्रद्धालु आस्था और भावनाओं के साथ दर्शन के लिए पहुंचता है। उनके मनोभावों को समझना और दर्शन में यथोचित सहयोग देना पुजारी, अधिकारी और कर्मचारियों सभी का दायित्व है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रयास यह होना चाहिए कि श्रद्धालु दर्शन के साथ अच्छा अनुभव और आत्मीय व्यवहार की स्मृतियां भी लेकर लौटे।
महाकाल मंदिर में कार्रवाई
श्रावण के पहले सोमवार को महाकाल मंदिर में बड़ा एक्शन लिया गया, जहां भस्म आरती व्यवस्था में गंभीर खामियां मिलने पर कलेक्टर ने कई कर्मचारियों को हटा दिया।

