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2026-10-17

माता-पिता के विरोध के बावजूद 20 वर्षीय महिला जैन साध्वी बनने को स्वतंत्र: एमपी हाई कोर्ट

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, इंदौर।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक 20 वर्षीय महिला को राहत प्रदान की है, जो सांसारिक जीवन त्यागकर जैन साध्वी बनना चाहती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि एक बालिग नागरिक के तौर पर, वह अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने और अपनी पसंद के धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। इंदौर बेंच के जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने 7 सितंबर को महिला की रिट याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया।

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माता-पिता का विरोध और महिला की मांग

महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि उसने श्वेतांबर जैन धर्म अपनाने, दीक्षा लेने और साध्वी के तौर पर धार्मिक मार्ग पर चलने का निर्णय लिया था। हालांकि, उसके माता-पिता और रिश्तेदार उसके इस फैसले का विरोध कर रहे थे और उसे परेशान कर रहे थे। याचिका में महिला ने पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की थी।

कोर्ट की टिप्पणी और कानूनी स्थिति

सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा कि कोर्ट ने दी गई दलीलों पर विचार किया है और ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता, जो 20 वर्ष की है और भारत की नागरिक है, अपने तरीके से धर्म या धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने और अपनी मर्जी से जीवन जीने की हकदार है। मामले के विशिष्ट तथ्यों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे महिला और उसके माता-पिता, दोनों के प्रति समान सहानुभूति है। परंतु, कानून कहता है कि याचिकाकर्ता के बालिग (18 वर्ष से अधिक उम्र) और भारत का नागरिक होने के नाते, उसे अपने पारिवारिक और अन्य कानूनी अधिकारों की सुरक्षा पाने का हक है और किसी भी व्यक्ति द्वारा पैदा की गई किसी भी रुकावट को कानून की दृष्टि में स्वीकृति नहीं दी जा सकती।

पुलिस मदद के निर्देश

न्यायाधीश ने महिला से कहा कि यदि उसके माता-पिता या कोई अन्य व्यक्ति उसके खिलाफ जबरदस्ती के तरीके अपनाता है, तो वह मदद के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन या अधिकारी के पास आवेदन कर सकती है। कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एआईआर 2006 एससी 2522 में दर्ज एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में कहा गया था कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोग अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं और कोर्ट को ऐसे लोगों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। हाई कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि यदि महिला की ओर से ऐसा कोई आवेदन दिया जाता है, तो संबंधित अधिकारी या स्टेशन इंचार्ज मामले की जांच करेंगे और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुसार तुरंत कार्रवाई करेंगे।