पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने इंदौर में ‘क्यों रूठ जाती है प्रकृति’ विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि अब पेड़ नहीं, पानी लगाने का समय आ गया है। उन्होंने नदियों को पुनर्जीवित करने और वर्षा जल संचय की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. जोशी ने बताया कि जल संकट अब देशभर की समस्या है और भारत का ट्रॉपिकल देश होना एक लाभ है। उन्होंने मानवीय हस्तक्षेप के कारण बदलते मौसम, कृषि के नकारात्मक प्रभाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बजाय प्राकृतिक बुद्धिमत्ता पर काम करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने पहाड़ों पर पर्यटकों की संख्या नियंत्रित करने की भी बात कही।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिल्ली में 7वें अंतर्राष्ट्रीय नवकरणीय ऊर्जा सम्मेलन में कहा कि मध्य प्रदेश 2030 तक देश के 500 गीगा वॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि राज्य की नवकरणीय ऊर्जा क्षमता पिछले 12 वर्षों में 438 मेगावॉट से बढ़कर 11,000 मेगावाट हो गई है। रीवा अल्ट्रा मेगा सौर परियोजना ने कोयले से सस्ती सौर ऊर्जा का टैरिफ स्थापित किया, जबकि आगर-शाजापुर-नीमच परियोजना ने रिकॉर्ड न्यूनतम टैरिफ हासिल किया। राज्य में ऊर्जा भंडारण और रूफटॉप सौर योजनाओं का भी तेजी से विकास हो रहा है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश देश में सर्वाधिक वन आवरण खोने वाला राज्य बन गया है, जिसने 2021 से 2023 के बीच 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र गंवा दिया। विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग परिवर्तन में भी राज्य पहले स्थान पर है, जहां पिछले पांच वर्षों में 24,969.87 हेक्टेयर वन भूमि का भूमि उपयोग बदला गया। यह गिरावट देश के कुल वन क्षेत्र में हुई वृद्धि के विपरीत है, जबकि कई अन्य राज्यों ने वन क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की है।
मध्य प्रदेश में पिछले चार दिनों से भारी बारिश थमने के कारण मानसून सुस्त पड़ गया है। मौसम विभाग ने 5 अगस्त तक ऐसी ही स्थिति रहने का अनुमान लगाया है, लेकिन 6 अगस्त से पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से मानसून पुनः सक्रिय होगा और कई जिलों में तेज बारिश की संभावना है। प्रदेश में अब तक औसतन 404.2 मिमी बारिश दर्ज हुई है, जो सामान्य से 16 प्रतिशत कम है। पूर्वी मध्य प्रदेश में 20 प्रतिशत और पश्चिमी मध्य प्रदेश में 11 प्रतिशत की कमी है, हालांकि कुछ जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा हुई है।
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आइसर) भोपाल और मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) के विज्ञानियों के एक एआई अध्ययन से खुलासा हुआ है कि भोपाल का बड़ा तालाब वर्ष 2050 के प्री-मानसून सीजन तक 40 से 60 प्रतिशत तक सिकुड़ सकता है। यह शोध रिमोट सेंसिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर 1980 से 2024 तक के आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन चेतावनी देता है कि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से तालाब का जलभराव क्षेत्र 40 प्रतिशत तक घट जाएगा, जिसका सबसे अधिक असर मई-जून में दिखेगा।