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मध्य प्रदेश की 155 जल परीक्षण प्रयोगशालाओं में रासायनिक जांच का अभाव

मध्य प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत पानी की गुणवत्ता जांच में गंभीर कमियां सामने आई हैं। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की सभी 155 जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं में रासायनिक विषाक्तता जांच की सुविधा नहीं है। केवल एक राज्य-स्तरीय प्रयोगशाला में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) का परीक्षण संभव है। कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया, जिसके बाद उन्होंने राज्य सरकार से विस्तृत जांच की मांग की है। प्रदेश के 77.21% घरों में नल कनेक्शन हैं, लेकिन 23 जिलों में पेयजल आपूर्ति कवरेज 70% से कम है।

उज्जैन के 6 सप्तसागरों का पानी स्नान योग्य नहीं, एनजीटी ने 30 दिन में सुधार के निर्देश दिए

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की सेंट्रल जोन बेंच ने उज्जैन के सप्तसागरों की बदहाल स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताई है। अधिकरण के अनुसार, गोवर्धन सागर, विष्णु सागर, पुरुषोत्तम सागर, क्षीर सागर, रुद्र सागर और पुष्कर सागर सहित छह सागरों का पानी स्नान योग्य नहीं है, फिर भी श्रद्धालु इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कर रहे हैं। एनजीटी ने इसे श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य और आस्था से सीधा खिलवाड़ बताया।

कांग्रेस अध्यक्ष पटवारी का आरोप: भोपाल में दूषित पेयजल आपूर्ति, 90% सैंपल में फीकल कोलीफॉर्म

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भोपाल में दूषित पेयजल आपूर्ति को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बड़े तालाब से सप्लाई होने वाले 90% पानी के सैंपल में ‘फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया’ मिला है, जबकि कोलार योजना के 25% सैंपल भी मानकों पर खरे नहीं उतरे। पटवारी ने पेयजल व्यवस्था को विफल बताते हुए जलजनित बीमारियों का खतरा जताया। कांग्रेस ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच, दोषी अधिकारियों पर एफआईआर और कड़ी कार्रवाई के साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल व चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। कांग्रेस ने सुरक्षित पेयजल के अधिकार के लिए संघर्ष की चेतावनी भी दी।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का नदियों में दूध अर्पित करने पर प्रतिबंध से इनकार, पर्यावरणीय संतुलन पर बल

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने नदियों में दूध अर्पित करने को आस्था का विषय बताया है और इस पर प्रतिबंध से इनकार किया। हालांकि, एनजीटी ने चेतावनी दी कि हजारों लीटर दूध प्रवाहित करने से जल पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है, इसलिए आस्था और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन आवश्यक है। यह आदेश सीहोर जिले में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाने की घटना के बाद आया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में तत्काल गंभीर दुष्प्रभाव नहीं पाए गए, लेकिन विशेषज्ञों ने भविष्य में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड बढ़ने से जलीय जीवों को खतरे की आशंका जताई।