इंदौर के पीपल्याहाना तालाब का पानी हरा पड़ने लगा है और उसमें काई जम रही है, जिससे गंदगी मिलने की आशंका बढ़ गई है। यह तालाब आसपास के क्षेत्र में भूजल रिचार्जिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और इसके दूषित पानी से जमीन में पहुंचने वाले पानी के भी दूषित होने का खतरा है। नगर निगम द्वारा स्टॉर्म वाटर लाइन से पानी छोड़े जाने के बावजूद, पानी का हरा होना गंदगी के प्रवेश का संकेत दे रहा है। ई-कोलाई सहित अन्य बैक्टीरिया भूजल में पहुंचकर उसे दूषित कर सकते हैं, जैसा कि पूर्व में इंदौर के बोरिंग पानी में पाया गया था, जिसका सेवन जानलेवा हो सकता है।
इंदौर की मूसाखेड़ी क्षेत्र स्थित अजय बाग कॉलोनी के निवासी पिछले दो माह से दूषित पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं। नर्मदा जल आपूर्ति के दौरान नलों से काला और बदबूदार पानी आता है, जिससे सीवेज जैसी दुर्गंध आती है। रहवासियों को बीमारियों का खतरा है और कई लोग बीमार भी हो चुके हैं। पीने के पानी के लिए उन्हें बाजार से पानी खरीदना पड़ रहा है। सीएम हेल्पलाइन और नगर निगम के 311 एप पर शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन आरोप है कि उनका समाधान किए बिना ही निराकरण दिखा दिया गया। रहवासी पुरानी पाइपलाइन में सीवरेज के पानी के मिश्रण की आशंका जता रहे हैं और स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।
इंदौर में भागीरथपुरा त्रासदी में दूषित पानी से 35 लोगों की मौत के बाद सरकार ने जल सुरक्षा पर कड़े कदम उठाए हैं। प्रशासन ने सभी जल स्रोतों का हेल्थ रिपोर्ट कार्ड बनाने, उनकी जियो टैगिंग करने और एक विशेष मॉनिटरिंग सेल गठित करने का निर्णय लिया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राज्य के पर्यावरण प्लान संशोधित किए हैं। एक नौ-सूत्रीय कार्ययोजना बनाई गई है जिसमें नदियों, तालाबों और भूजल स्रोतों की निगरानी व संरक्षण पर जोर दिया गया है। दूषित पानी के हॉट स्पॉट चिह्नित कर सुधार कार्य किए जाएंगे और जनता के लिए शिकायत निवारण हेतु एक ऐप भी लॉन्च किया गया है।
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 35 मौतों के बाद जल स्रोतों की निगरानी और संरक्षण के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य के सभी 55 जिलों के डिस्ट्रिक्ट एनवायरनमेंट प्लान में संशोधन किया गया है। इंदौर में वॉटर क्वालिटी मॉनिटरिंग सेल बनेगी, जो नदियों, नालों और तालाबों की निगरानी कर हेल्थ रिपोर्ट कार्ड बनाएगी। नौ प्रमुख बिंदुओं पर कार्ययोजना बनी है, जिसमें भूजल, सतही जल और दूषित पानी का उपचार शामिल है। यह योजना 12 से 24 महीनों में लागू होगी।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध अर्पण के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि धार्मिक अनुष्ठानों में दूध अर्पित करने पर रोक लगाने वाला कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। हालांकि, एनजीटी ने इसे पर्यावरणीय दृष्टि से अनुचित माना और भविष्य में ऐसे आयोजनों पर विशेष निगरानी तथा एहतियात बरतने के निर्देश दिए। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की रिपोर्ट में नर्मदा की जल गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया, लेकिन बड़ी मात्रा में दूध प्रवाहित करना पर्यावरण के लिए उचित नहीं माना गया।