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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिजिटल पहल से न्याय प्रक्रिया हुई आसान

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने न्याय प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और तकनीक-आधारित बनाने के लिए कई डिजिटल नवाचार किए हैं। ई-कोर्ट सेवाओं के माध्यम से पक्षकार अब घर बैठे अपने प्रकरण की स्थिति देख सकते हैं, जिससे कोर्ट आने-जाने का समय और खर्च कम हुआ है। जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों को एकीकृत डिजिटल व्यवस्था से जोड़ा गया है। हाई कोर्ट और जिला न्यायालयों में ई-सेवा केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो अधिवक्ताओं और पक्षकारों को ई-फाइलिंग तथा अन्य आनलाइन न्यायिक सेवाओं में सहायता प्रदान करते हैं।

हाई कोर्ट: न्याय पंचायत सरकारी जमीन का मालिकाना हक नहीं दे सकती, 27 साल पुरानी अपील खारिज

हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्याय पंचायत को सरकारी जमीन का मालिकाना हक किसी निजी व्यक्ति को देने का अधिकार नहीं है। जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने सतना जिले के रघुराज नगर में 40 डिसमिल जमीन से जुड़ी 27 साल पुरानी अपील खारिज कर दी। यह जमीन 1959 में एक विस्थापित व्यक्ति को दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि सक्षम राजस्व अधिकारी ही सरकारी जमीन का वैध हस्तांतरण कर सकता है और लंबे समय तक कब्जे या न्याय पंचायत की अनुमति से निजी स्वामित्व नहीं मिलता।

79 वर्ष पूरे होते ही मिलेगी 20% अतिरिक्त पेंशन, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें 79 वर्ष की उम्र पूरी करने पर पेंशनरों को 20 प्रतिशत अतिरिक्त पेंशन देने के प्रावधान को चुनौती दी गई थी। अब पेंशनरों को 79 वर्ष पूरे करते ही यह लाभ मिलेगा। पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार से सभी पात्र पेंशनरों को एरियर्स सहित यह लाभ लागू करने का अनुरोध किया है। पहले यह लाभ 80 वर्ष की आयु पूरी होने के एक माह बाद मिलता था।

देशी शराब टेंडर विवाद: हाई कोर्ट ने सात कारोबारियों की याचिकाएं खारिज कीं, सीसीआई जांच से रोक हटी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 2016-17 की देशी मदिरा टेंडर प्रक्रिया से जुड़े कथित सिंडीकेट और प्रतिस्पर्धा अनियमितताओं के मामले में सात शराब कारोबारियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) को जांच पूरी कर प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 27 के तहत अंतिम आदेश पारित करने के निर्देश दिए हैं, साथ ही सीसीआई की जांच पर लगी रोक भी हटा दी है। युगलपीठ ने तर्क दिया कि कंपनियों के पास सीसीआई की कार्रवाई के विरुद्ध एनसीएलएटी में अपील करने का वैधानिक विकल्प उपलब्ध था, इसलिए सीधे हाई कोर्ट में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 35 हजार से अधिक अवमानना केस लंबित, निराकरण में चुनौती बढ़ी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 35 हजार से अधिक अवमानना प्रकरण लंबित हैं, जिससे लंबित मामलों के निराकरण की चुनौती जटिल हो गई है। आदेशों का पालन न होने पर पक्षकार दोबारा न्यायालय का रुख करते हैं, जिससे अतिरिक्त न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है। मार्च 2025 के अंत तक हाई कोर्ट में 4.71 लाख से अधिक प्रकरण लंबित थे। आदेशों के समय पर पालन न होने से न्यायालय के अतिरिक्त समय और संसाधनों की मांग बढ़ जाती है, जिससे मूल मामलों के निराकरण की गति प्रभावित होती है।

निजी अधिवक्ता से याचिका पर मप्र हाई कोर्ट का सख्त रुख, डीएफओ-रेंजर पर होगी विभागीय जांच

मप्र हाई कोर्ट ने निजी अधिवक्ता के माध्यम से पुनर्विचार याचिका दाखिल कराने पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की बेंच के समक्ष सुनवाई में प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (पीसीसीएफ) शुभ रंजन सेन व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। उन्होंने सतना के संबंधित डीएफओ और रेंजर की भूमिका की विभागीय जांच कर कार्रवाई का भरोसा दिलाया। कोर्ट ने 30 दिन में कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला सतना की वन समितियों में कार्यरत 25 मजदूरों के न्यूनतम वेतनमान से संबंधित है, जिनके लिए हाई कोर्ट ने पहले न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था।

हाई कोर्ट: मामलों के निपटारे में देरी का कारण केवल स्थगन नहीं, न्यायाधीशों व सुविधाओं की कमी भी

जबलपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि लंबित मामलों के निपटारे में देरी का कारण केवल अनावश्यक स्थगन ही नहीं है, बल्कि न्यायाधीशों, न्यायालय कक्षों, आधारभूत सुविधाओं और मंत्रालयीन कर्मचारियों की कमी भी इसमें प्रमुख भूमिका निभाती है। वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक लालवानी ने अनावश्यक स्थगन और बेबुनियाद मुकदमों पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देशों की मांग की थी। हाई कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां भिन्न होती हैं, इसलिए स्थगन या अंतरिम आवेदनों के लिए कोई निश्चित नियम नहीं बन सकता।

डीपफेक युग में वास्तविक-कृत्रिम साक्ष्य पहचानना चुनौती: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा

ग्वालियर में आयोजित क्षेत्रीय न्यायिक सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने डीपफेक तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वास्तविक और कृत्रिम साक्ष्य के बीच अंतर करना न्यायपालिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने न्यायिक अधिकारियों से बदलते समाज और तकनीक के अनुरूप अपनी सोच और कानूनों की व्याख्या का विस्तार करने का आग्रह किया। उन्होंने जोर दिया कि न्यायदान केवल कानूनी धाराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को समझना भी महत्वपूर्ण है।

ग्वालियर में वेस्ट जोन रीजनल ज्यूडिशियरी कांफ्रेंस का समापन: न्यायिक शिक्षा के डिजिटल रूपांतरण पर मंथन

ग्वालियर में पहली बार आयोजित दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल ज्यूडिशियरी कांफ्रेंस का समापन हुआ, जिसमें न्यायिक शिक्षा के डिजिटल रूपांतरण और संवेदनशील व समावेशी न्याय के निर्माण पर गहन मंथन हुआ। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात और उड़ीसा उच्च न्यायालयों के जस्टिस ने महत्वपूर्ण सत्रों को संबोधित किया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ ग्वालियर के प्रशासनिक न्यायाधिपति जीएस अहलूवालिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया। समापन अवसर पर बीएसएफ टेकनपुर के राष्ट्रीय श्वान प्रशिक्षण केंद्र द्वारा कृषि विश्वविद्यालय परिसर में एक आकर्षक डॉग शो का भी प्रदर्शन किया गया, जिसमें श्वानों ने हैरतअंगेज करतब दिखाए।

सुप्रीम कोर्ट का पैदल यात्रियों की सुरक्षा पर सख्त रुख, पांच शहरों में अतिक्रमण-मुक्त फुटपाथ बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में पैदल चलने वालों की सुरक्षा पर सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को पांच ऐसे शहरों की पहचान करने का निर्देश दिया है, जहां हर सड़क के साथ अतिक्रमण-मुक्त और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ बनाने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सके। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने केंद्र से यह भी पूछा कि इन निर्देशों को लागू करने के लिए कौन-सा केंद्रीय प्राधिकरण जिम्मेदार होगा और उसके पास पर्याप्त बजट, कर्मचारी व बुनियादी ढांचा है या नहीं। सरकारी वकील ने जल्द जानकारी देने का भरोसा दिया है।