मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दमोह के 2009 के हत्या मामले में पुलिस जांच और अभियोजन के साक्ष्यों पर गंभीर सवाल उठाते हुए दो भाइयों, तुलसीराम राजपाल और हरप्रसाद, की उम्रकैद की सजा रद्द कर उन्हें बरी कर दिया। जिला अदालत ने 29 जून 2012 को उन्हें दोषी ठहराया था, जिसके बाद उन्होंने लगभग 17 साल जेल में बिताए। न्यायालय ने प्राथमिकी की विश्वसनीयता, कथित हत्यारे चाकू पर खून के निशान न होने, प्रत्यक्षदर्शियों के देरी से दर्ज बयानों और मृत्यु के समय को लेकर विरोधाभासी साक्ष्यों को आधार बनाया। न्यायालय ने कहा कि संदेहास्पद और विरोधाभासी साक्ष्यों पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत के उम्रकैद के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। जस्टिस वी.के. अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की बेंच ने रेडियोलॉजिस्ट की मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा जताया, जिसके अनुसार पीड़िता घटना के समय 18 वर्ष से अधिक की थी। हाईकोर्ट ने स्कूल रिकॉर्ड की तुलना में रेडियोलॉजिस्ट की राय को अधिक विश्वसनीय माना। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि पीड़िता नाबालिग थी या उसे जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया था। यह मामला बालाघाट जिले की वारासिवनी कोर्ट से संबंधित था।