देश में बाघों की संख्या को लेकर पिछले दो दशकों के आंकड़ों पर नई बहस छिड़ गई है। वर्ष 2001-02 में पगमार्क पद्धति से देश में 3,642 बाघ दर्ज किए गए थे, जबकि 2022 की गणना में आधुनिक तकनीकों से 3,682 बाघ मिले। 26 साल के अंतराल में संख्या में यह मामूली अंतर गणना पद्धतियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि या तो पुरानी पद्धति से अधिक अनुमान लगाया गया था, या संरक्षण की गति अपेक्षित नहीं है। सरकार प्रतिवर्ष छह प्रतिशत वृद्धि मानती है, लेकिन आंकड़े और 2500 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च विरोधाभास पैदा करते हैं।