इंदौर के पीपल्याहाना तालाब का पानी हरा पड़ने लगा है और उसमें काई जम रही है, जिससे गंदगी मिलने की आशंका बढ़ गई है। यह तालाब आसपास के क्षेत्र में भूजल रिचार्जिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और इसके दूषित पानी से जमीन में पहुंचने वाले पानी के भी दूषित होने का खतरा है। नगर निगम द्वारा स्टॉर्म वाटर लाइन से पानी छोड़े जाने के बावजूद, पानी का हरा होना गंदगी के प्रवेश का संकेत दे रहा है। ई-कोलाई सहित अन्य बैक्टीरिया भूजल में पहुंचकर उसे दूषित कर सकते हैं, जैसा कि पूर्व में इंदौर के बोरिंग पानी में पाया गया था, जिसका सेवन जानलेवा हो सकता है।
जबलपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश के कारण गहराते पेयजल संकट की समस्या सामने आई है। पहले 70-80 फीट पर मिलने वाला पानी अब 100 फीट पर भी उपलब्ध नहीं है। जिले के 500 से अधिक ग्राम पंचायतों में स्थापित 10 हजार हैंडपंपों में से 3500 से अधिक का जलस्तर 10 से 30 फीट नीचे गिर गया है, जिससे लगभग 40 प्रतिशत हैंडपंप पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। शिकायतें बढ़ने के बावजूद भूजल स्तर में गिरावट के कारण समस्या बनी हुई है, और अमृत जल योजना का शुरू न होना भी संकट को बढ़ा रहा है।
इंदौर में जुलाई माह में पर्याप्त बारिश के बावजूद शहर के तालाबों का जलस्तर अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ा है। शहर की प्यास बुझाने वाले यशवंत सागर में अभी 12 फीट पानी है, जबकि इसकी क्षमता 19 फीट है और यह अभी भी 7 फीट खाली है। पिछले साल जुलाई में यह तालाब लबालब था। अन्य तालाब जैसे बिलावली और लिंबोदी भी बायपास निर्माण के कारण चैनलों के अवरुद्ध होने से धीमी गति से भर रहे हैं, जिससे भूजल स्तर पर असर पड़ रहा है। तालाबों को पूरी तरह भरने में अगस्त माह का समय लग सकता है।
भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े मामले में जबलपुर हाई कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास भूजल के दूषित होने के आरोपों को गंभीरता से लिया है। न्यायालय ने मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPPCB) को विशेषज्ञ समिति गठित कर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से भूजल के नमूनों की वैज्ञानिक जांच कराने और 13 अगस्त तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। यह आदेश वर्ष 2004 से लंबित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें हस्तक्षेपकर्ताओं ने स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर खतरे की शिकायतें उठाई थीं। मामले की अगली सुनवाई तीन सितंबर को होगी।