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कारगिल युद्ध की स्मृतियां 27 साल बाद भी ताजा, सूबेदार लक्ष्मण सिंह ने याद किए संघर्ष के पल

कारगिल विजय को 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी सूबेदार लक्ष्मण सिंह जैसे रणबांकुरों की स्मृतियों में युद्ध के पल ताजा हैं। इंदौर निवासी सूबेदार लक्ष्मण सिंह, जो 18 गढ़वाल राइफल्स में थे, ने द्रास, तोलोलिंग और बटालिक सेक्टर में पाकिस्तान के घुसपैठियों से भारतीय चौकियों को मुक्त कराने के संघर्ष को याद किया। उन्होंने घायल साथियों को कंधों पर ढोकर बेस कैंप तक पहुंचाने का कार्य किया और अपने शहीद साथी राइफलमैन विक्रम सिंह के बेटे को भी 18 गढ़वाल राइफल्स में देश सेवा करते देख गर्व महसूस करते हैं। युद्ध के दौरान 527 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।

कारगिल युद्ध: भारतीय सेना ने साहस और तोपखाने से ऊंची चोटियों पर दुश्मन को हराया

कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस, धैर्य और सैन्य कौशल का प्रतीक है, जिसे हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1999 में द्रास, बटालिक सहित दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में लड़े गए इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने सीमित ऑक्सीजन और ऊंची चोटियों पर दुश्मन की मौजूदगी जैसी विषम चुनौतियों का सामना किया। सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने बताया कि शुरुआती सामरिक बढ़त के बावजूद, भारतीय सेना ने सुनियोजित अभियान, असाधारण साहस और प्रभावी तोपखाना समर्थन से सभी ठिकानों को मुक्त कराया। युद्ध में 527 सैनिक शहीद हुए और 1,300 से अधिक घायल हुए।