वर्ष 1857 में भारत की आजादी की पहली चिंगारी भड़कने के साथ ही भोपाल रियासत की सैन्य छावनी सीहोर में भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया था। 6 अगस्त 1857 को रिसालदार वली शाह और कोठ हवलदार महावीर कोठ के नेतृत्व में सैनिकों ने बगावत कर ‘सिपाही बहादुर सरकार’ का गठन किया। क्रांतिकारियों ने सरकारी तंत्र पर कब्जा कर लिया। इसी दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने नवाब सिकंदर बेगम से क्रांतिकारियों का समर्थन करने की अपील की, जिसे बेगम ने अस्वीकार कर दिया। 14 जनवरी 1858 को अंग्रेज जनरल ह्यू रोज की सेना ने सीहोर में 356 क्रांतिकारियों को शहीद कर दिया। वली शाह और महावीर कोठ को 2 फरवरी 1858 को फांसी दी गई।
असम में सीआरपीएफ की 34वीं बटालियन में हुई गोलीबारी में बालाघाट के जवान विष्णु बघेल शहीद हो गए। मंगलवार सुबह एएसआई बलानी प्रेमावरम ने क्वार्टर गार्ड और बैरक में अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें एसआई राम नवल सिंह यादव भी शहीद हुए और एएसआई माने गोबिंद घायल हो गए। आरोपी एएसआई ने बाद में आत्महत्या कर ली। शहीद विष्णु बघेल (44) अपने परिवार के इकलौते पुत्र थे, उनका पार्थिव शरीर बुधवार को बालाघाट स्थित पैतृक गांव लाया जाएगा।
राजस्थान के जैसलमेर में सड़क हादसे में शहीद हुए मेजर हमजा आरिफ का पार्थिव शरीर रविवार सुबह इंदौर स्थित उनके निवास पर पहुंचा। उन्हें सैन्य सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया। अंतिम दर्शन के लिए रखे गए पार्थिव शरीर से तिरंगा हटाकर उनकी पत्नी को सौंपा गया। इस दुर्घटना में मेजर हमजा की मौत हो गई थी, जबकि दो अन्य लेफ्टिनेंट घायल हो गए थे। परिवार जैसलमेर से विशेष सैन्य वाहन में पार्थिव देह लेकर इंदौर पहुंचा था।
इंदौर निवासी मेजर हमजा आरिफ जैसलमेर में ड्यूटी से लौटते समय एक सड़क हादसे में बलिदानी हो गए। सैन्य वाहन के ऊंट से टकराकर पलटने से उन्हें सिर में गंभीर चोट आई, जिसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस दुर्घटना में दो अन्य सैन्यकर्मी भी घायल हुए। 31 वर्षीय मेजर हमजा नौ वर्षों से सेना में कार्यरत थे और एक माह पूर्व ही उनका विवाह तय हुआ था। उनका पार्थिव शरीर शनिवार देर रात इंदौर पहुंचेगा और रविवार को सैन्य सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।
कारगिल विजय को 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी सूबेदार लक्ष्मण सिंह जैसे रणबांकुरों की स्मृतियों में युद्ध के पल ताजा हैं। इंदौर निवासी सूबेदार लक्ष्मण सिंह, जो 18 गढ़वाल राइफल्स में थे, ने द्रास, तोलोलिंग और बटालिक सेक्टर में पाकिस्तान के घुसपैठियों से भारतीय चौकियों को मुक्त कराने के संघर्ष को याद किया। उन्होंने घायल साथियों को कंधों पर ढोकर बेस कैंप तक पहुंचाने का कार्य किया और अपने शहीद साथी राइफलमैन विक्रम सिंह के बेटे को भी 18 गढ़वाल राइफल्स में देश सेवा करते देख गर्व महसूस करते हैं। युद्ध के दौरान 527 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।