भोपाल, जिसे झीलों का शहर कहा जाता है, गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है, जहाँ तालाबों, पहाड़ियों और हरित क्षेत्रों पर लगातार अतिक्रमण हो रहा है। इसके विपरीत, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों ने तालाब संरक्षण के लिए अलग प्राधिकरण स्थापित किए हैं और नियम तोड़ने वालों के लिए 5 साल तक की जेल का प्रावधान किया है। भोपाल में प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की जिम्मेदारी विभिन्न एजेंसियों में बंटी हुई है, जिससे समन्वय की कमी और कार्रवाई में जिम्मेदारी तय न हो पाने की समस्या है।
उज्जैन की श्री महाकालेश्वर मंदिर समिति, जिसे हाल ही में ई-गवर्नेंस पुरस्कार मिला है, की आधिकारिक वेबसाइट भारत सरकार के जीआईजीडब्ल्यू 3.0 मानकों का पालन नहीं कर रही है। वेबसाइट पर पारदर्शिता, जवाबदेही और श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़ी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। भक्तों द्वारा आधार कार्ड अपलोड करने जैसी स्थितियों में डेटा संरक्षण नीतियों की अनुपलब्धता चिंता का विषय है। भस्म आरती सहित अन्य सेवाओं की ऑनलाइन बुकिंग में भी पारदर्शिता की कमी पाई गई है। इस संबंध में अधिकारियों ने पांच दिन बाद भी कोई जवाब नहीं दिया है।