पन्ना टाइगर रिजर्व में आगामी पर्यटन सीजन वन्यजीव प्रेमियों के लिए रोमांचक रहने वाला है। बाघों की नई पीढ़ी लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है, जिसमें पी-652 के नए शावकों के बाद अब पी-141 की उप-वयस्क बेटी ने ध्यान खींचा है। इस युवा बाघिन को पन्ना की ‘भविष्य की रानी’ के रूप में देखा जा रहा है, जो जल्द ही अपना स्वतंत्र क्षेत्र स्थापित कर सकती है। पन्ना की सफल बाघ पुनर्स्थापना कहानी के कारण यह नई पीढ़ी महत्वपूर्ण है, हालांकि उसे क्षेत्र स्थापित करने और शिकार खोजने जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना होगा। पर्यटक इस पर विशेष नजर रखेंगे।
बांधवगढ़ नेशनल पार्क जंगली हाथियों का नया ठिकाना बन गया है, जहां 70 से अधिक हाथी पिछले आठ सालों से रह रहे हैं। छत्तीसगढ़ और झारखंड से आए इन हाथियों ने पार्क की जैव विविधता को समृद्ध किया है, जबकि मध्य प्रदेश के अन्य जिलों में ये चुनौती बने हुए हैं। विशेषज्ञ बांधवगढ़ में ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ शुरू करने की वकालत कर रहे हैं ताकि हाथियों की सुरक्षा हो सके और हाथी-मानव द्वंद्व समाप्त हो। यह प्रोजेक्ट स्थानीय लोगों को शिक्षित करने, रोजगार सृजित करने और वन्यजीवों के संरक्षण में सहायक होगा।
विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में आधी रात को एक दुर्लभ जंगल कैट देखी गई। वर्षा से भीगी घास के बीच अपनी चमकती आंखों के साथ दिखी इस शर्मीली बिल्ली को वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर चेतन घरपुरे ने कैमरे में कैद किया। जंगल कैट अपनी एकांतप्रिय प्रकृति और शिकारी कौशल के कारण आसानी से दिखाई नहीं देती। विशेषज्ञों के अनुसार, बांधवगढ़ बाघों के अलावा अनेक दुर्लभ वन्यजीवों का भी आवास है। यह घटना बांधवगढ़ की समृद्ध जैव विविधता और उसके संरक्षण के महत्व को दर्शाती है।
बालाघाट के सोनेवानी कंजर्वेशन रिजर्व में एक साल के भीतर दो बाघों की मौत के बाद वन विभाग पूरी तरह सतर्क हो गया है। हाल ही में बाघ का शव मिलने पर विभाग ने पूरे रिजर्व क्षेत्र में लगातार निगरानी के लिए तीन विशेष गश्ती टीमें तैनात की हैं। बहियाटिकुर सर्किल में हुई इन मौतों में से एक बाघ आपसी संघर्ष में मरा, जबकि एक बाघिन का शव नाले की बाढ़ में बहकर आया था, जिसे वनकर्मियों ने अवैध रूप से जला दिया था। क्षेत्र में बाघों की बढ़ती संख्या और सीमित क्षेत्र के कारण आपसी संघर्ष बढ़ रहा है, जिससे बाघ आबादी वाले क्षेत्रों में भी देखे जा रहे हैं।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर इंसान और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के लिए एक राज्यवार मास्टर प्लान तैयार किया गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून द्वारा दो साल के अध्ययन के बाद तैयार की गई यह रिपोर्ट 20-25 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित है। इसका मुख्य लक्ष्य प्रतिवर्ष होने वाली लगभग 600 मानवीय और 120 हाथी मौतों को लगभग शून्य तक लाना है। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को सर्वाधिक संवेदनशील राज्य चिह्नित किया गया है, जहाँ 100 हॉटस्पॉट हैं। यह योजना टकराव के बाद मुआवजा देने के बजाय पहले से रोकथाम पर केंद्रित है।
देश में बाघों की संख्या को लेकर पिछले दो दशकों के आंकड़ों पर नई बहस छिड़ गई है। वर्ष 2001-02 में पगमार्क पद्धति से देश में 3,642 बाघ दर्ज किए गए थे, जबकि 2022 की गणना में आधुनिक तकनीकों से 3,682 बाघ मिले। 26 साल के अंतराल में संख्या में यह मामूली अंतर गणना पद्धतियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि या तो पुरानी पद्धति से अधिक अनुमान लगाया गया था, या संरक्षण की गति अपेक्षित नहीं है। सरकार प्रतिवर्ष छह प्रतिशत वृद्धि मानती है, लेकिन आंकड़े और 2500 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च विरोधाभास पैदा करते हैं।
नरसिंहपुर से रेस्क्यू कर ‘स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ’ में लाई गई एक मादा तेंदुए के उपचार पर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि तीन महीने के इलाज के दौरान उसके 16 दांत टूट गए, जिससे वह शिकार करने और भोजन करने में असमर्थ है। एडवोकेट डॉ. दीपा कुलश्रेष्ठ ने कानूनी नोटिस भेजा है, जिसमें संस्थान की मान्यता और इलाज की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। वेटरनरी विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले की जांच के लिए एक विशेष समिति गठित की है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को वन्यजीव संरक्षण, विशेषकर मानव-हाथी संघर्ष के मामलों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप विस्तृत गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने राज्य के आग्रह पर इसके लिए चार माह का समय दिया। अगली सुनवाई छह माह बाद होगी। यह निर्देश रायपुर निवासी नितिन सिंघवी की याचिका पर आया, जिसमें छत्तीसगढ़ से आने वाले जंगली हाथियों द्वारा फसल नष्ट करने, मकानों को नुकसान पहुंचाने और जनहानि का आरोप लगाया गया था।
इंदौर का कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय बाघों की संख्या में देश में दूसरे स्थान पर है और छोटे चिड़ियाघरों में समग्र पशु विविधता तथा प्रजनन में पहले स्थान पर है। पिछले दशक में 26 बाघ शावकों का जन्म हुआ, जिनमें से 22 स्वस्थ बड़े हुए। वर्तमान में चिड़ियाघर में 13 बाघ, 15 शेर और 3 तेंदुए हैं, जिनकी कुल संख्या 31 है। जू प्रभारी डॉ. उत्तम यादव प्रजनन की सफलता का श्रेय तनावमुक्त वातावरण, सावधानीपूर्वक पैडिग्री जांच और पशु व्यवहार की वैज्ञानिक निगरानी को देते हैं। चिड़ियाघर के बाघों की मांग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है, जो देश भर से आगंतुकों को आकर्षित करते हैं।
मध्य प्रदेश ने बाघ संरक्षण में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिससे राज्य में बाघों की संख्या बढ़कर 785 हो गई है। पारंपरिक जंगल छोटे पड़ने लगे हैं और बाघ नए इलाकों में भी देखे जा रहे हैं। बाघों को ‘पुजारी’, ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘मौसी मां’ जैसे अनोखे नाम दिए गए हैं, जो पर्यटकों के बीच उनकी पहचान बढ़ाते हैं। मां से बिछड़े शावकों को जंगल में दोबारा बसाने का ‘रिवाइल्ड’ मॉडल सफल रहा है, जिससे 20 से अधिक शावकों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया है। दो नए टाइगर रिजर्व भी बनाए गए हैं और निगरानी बढ़ाई गई है।