मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जबलपुर में संस्कार कांवड़ यात्रा में भाग लिया, जहां उन्होंने पूज्य दादा गुरु के साथ कांवड़ उठाई और श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार धार्मिक पर्यटन और सनातन संस्कृति को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है, साथ ही देवस्थलों के विकास और कांवड़ यात्रियों को सुविधाएं प्रदान करने पर भी जोर दे रही है। मुख्यमंत्री ने संतों की तपस्या और सनातन संस्कृति की जड़ों पर प्रकाश डाला, तथा मां नर्मदा के महत्व का उल्लेख करते हुए सभी को शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। जबलपुर के बरगी बांध का जलस्तर भी तीन मीटर बढ़कर 417 मीटर तक पहुंचा है।
उज्जैन में आयोजित ‘भारतीय दृष्टि में Gen Z’ व्याख्यान में स्वामी अभिषेक ब्रह्मचारी ने विकसित भारत के लिए Gen Z को भारतीय संस्कारों और नवाचार का संगम अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन और एआई के युग में युवाओं को अपनी आधुनिक सोच भारतीय मूल्यों से जोड़नी होगी। स्वामी जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर जोर देते हुए युवाओं को सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और डिजिटल युग में जिम्मेदारी बरतने की सलाह दी। रोहित कुमार सिंह ने युवा ऊर्जा को राष्ट्रहित में लगाने का आह्वान किया।
धार की ऐतिहासिक भोजशाला में साध्वी ऋतंभरा ने मां वाग्देवी की आरती की और सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भोजशाला का संघर्ष सत्य की विजय है और इसने कृष्ण जन्मभूमि का मार्ग प्रशस्त किया है। साध्वी ऋतंभरा ने मां वाग्देवी के जल्द धार में विराजमान होने की बात कही और समाज से एकजुटता का आह्वान किया। उन्होंने यह भी बताया कि मालवा की भूमि धर्म के प्रति आग्रह रखने वाली है। इस बीच, धार भोजशाला को राष्ट्रीय सम्मान देने और स्मारक डाक टिकट जारी करने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है।
इस वर्ष तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से इंदौर तक 2100 किलोमीटर की नॉनस्टॉप सीताराम डाक कावड़ यात्रा 171 घंटों में पूरी होगी। अरण्यधाम संत आश्रम के संस्थापक महामंडलेश्वर रामजी बाबा द्वारा 2015 में शुरू की गई इस परंपरा में श्रद्धालु सावन माह में महादेव का जलाभिषेक करते हैं। 10 अगस्त को इंदौर से 250-300 श्रद्धालुओं का जत्था रामेश्वरम के लिए रवाना होगा, और 15 अगस्त को वहां से यात्रा की शुरुआत होगी। यात्रा के दौरान खान-पान के लिए 25 सदस्यीय रसोइयों का दल भी साथ रहेगा, जिसमें प्रत्येक कांवड़िया 150-200 किलोमीटर की दूरी बारी-बारी से दौड़ेगा।