इंदौर में एसोसिएशन ऑफ म्युनिसिपैलिटीज एंड डेवलपमेंट अथॉरिटीज (एएमडीए) द्वारा आयोजित अध्ययन दौरे में दिल्ली सहित नौ राज्यों के 26 वरिष्ठ अधिकारियों ने शहर के स्वच्छता एवं शहरी प्रबंधन मॉडल को समझा। अधिकारियों ने विभिन्न नवाचार-आधारित परियोजनाओं का निरीक्षण किया। वहीं, ग्राम बिहाड़िया में अतुल अग्रवाल द्वारा बिना अनुमति के काटी जा रही अवैध कॉलोनी पर प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर निर्माण ध्वस्त किए। इस कॉलोनी को खसरे में अवैध दर्ज करने का प्रस्ताव भेजा गया है। साथ ही, शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाकर 1.5 करोड़ रुपए की जमीन कब्जामुक्त कराई गई।
इंदौर जिला प्रशासन ने बुधवार को मल्हारगंज तहसील के ग्राम सिरपुर में करीब 40 करोड़ रुपये मूल्य की 2.711 हेक्टेयर सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया। बुलडोजर चलाकर अवैध निर्माण ध्वस्त किए गए। ‘न्यू लक्ष्मी नगर’ नाम से अवैध कॉलोनी बसाने वाले मुख्य आरोपित अज्जू खां को गिरफ्तार कर चंदननगर थाने में एफआइआर दर्ज की गई है, जबकि मास्टरमाइंड जफर खान की तलाश जारी है। आरोपित ने 100 से अधिक प्लॉट नोटरी पर बेचकर करोड़ों की धोखाधड़ी की थी। प्रशासन ने बेदखली आदेश जारी कर खरीदारों और पूरे नेटवर्क की जांच शुरू कर दी है।
टीकमगढ़ में कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर के रीडर शंकर प्रसाद श्रीवास्तव, उनकी पत्नी, मां और पुत्र के नाम दर्ज 3.5 एकड़ से अधिक सरकारी भूमि का नामांतरण निरस्त कर दिया है। जांच में पाया गया कि श्रीवास्तव ने अपने पद और प्रशासनिक प्रभाव का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेजों तथा नियमों की अनदेखी करते हुए इन जमीनों को अपने और परिवार के सदस्यों के नाम करा लिया था। इनमें ग्राम उत्तरी कर्री और मोगनगढ़ की भूमि शामिल है। प्रशासन ने सभी विवादित आदेश रद्द कर जमीनों को पुनः सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया है।
कर्नाटक सरकार ने ‘द आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्था के खिलाफ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोपों की जांच के लिए एसआईटी गठित की है। यह मामला बेंगलुरु के कागलीपुरा गांव से संबंधित है, जहां 290 एकड़ से अधिक गोमाला भूमि पर कब्जे का आरोप है। संस्था को 1985 में लीज पर मिली 41 एकड़ जमीन की अवधि 2015 में समाप्त हो चुकी है, फिर भी कब्जा बरकरार है। आर्ट ऑफ लिविंग ने आरोपों को बेबुनियाद बताया है और जांच का स्वागत किया है।
उज्जैन में महाकाल मंदिर पार्किंग के लिए उपयोग की जा रही 40 हजार वर्गफीट शासकीय भूमि की रजिस्ट्री को लेकर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई है। न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि शासकीय जमीन की रजिस्ट्री कैसे हो गई। एडवोकेट जयेश गुरनानी ने बताया कि यह जमीन 1950 में शासकीय कारखाने के नाम दर्ज थी, पर बाद में निजी नाम दर्ज हो गए। तहसीलदार की अनुशंसा के बावजूद यह जमीन एक कंपनी को पंजीकृत कर दी गई थी। न्यायालय ने सिंहस्थ 2028 का भी उल्लेख किया।