कारगिल विजय को 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी सूबेदार लक्ष्मण सिंह जैसे रणबांकुरों की स्मृतियों में युद्ध के पल ताजा हैं। इंदौर निवासी सूबेदार लक्ष्मण सिंह, जो 18 गढ़वाल राइफल्स में थे, ने द्रास, तोलोलिंग और बटालिक सेक्टर में पाकिस्तान के घुसपैठियों से भारतीय चौकियों को मुक्त कराने के संघर्ष को याद किया। उन्होंने घायल साथियों को कंधों पर ढोकर बेस कैंप तक पहुंचाने का कार्य किया और अपने शहीद साथी राइफलमैन विक्रम सिंह के बेटे को भी 18 गढ़वाल राइफल्स में देश सेवा करते देख गर्व महसूस करते हैं। युद्ध के दौरान 527 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
एम्स भोपाल और डीआरडीओ की प्रमुख प्रयोगशाला डीआईपीएएस ने देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों को कठिन परिस्थितियों में अधिक सक्षम और सुरक्षित बनाने के लिए हाथ मिलाया है। यह समझौता स्वदेशी तकनीकों और चिकित्सा समाधानों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे सियाचिन, लद्दाख, ऊंचे पहाड़ों और युद्ध क्षेत्र में तैनात जवानों को सीधा लाभ मिलेगा। शोध में सैनिकों पर अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और तनाव के प्रभावों का अध्ययन कर ऐसे उपाय विकसित किए जाएंगे, जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़े। परियोजना में पहनने योग्य स्मार्ट उपकरण भी बनाए जाएंगे। यह पहल विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करेगी और इसके लाभ आम मरीजों को भी मिलेंगे।