भारतीय नौसेना को हाल ही में दो स्वदेशी मिलिट्री-ग्रेड अंडरवाटर रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (आरओवी) प्रणाली प्राप्त हुई हैं, जिससे उसकी समुद्र के नीचे निगरानी और टोह लेने की क्षमताएं बढ़ी हैं। केरलम की मरीन रोबोटिक्स और एआई डीप-टेक कंपनी आईआरओवी ने इन आरओवी का निर्माण कर नौसेना को सौंपा है। ‘ट्राउट’ नाम का यह आरओवी भारत का पहला मिलिट्री-ग्रेड आरओवी है, जिसे सैन्य मानकों के अनुरूप डिजाइन किया गया है। भारतीय नौसेना ने कुल पांच आरओवी का ऑर्डर दिया था, जिसमें से दो की आपूर्ति हो चुकी है। यह उपलब्धि उन्नत अंडरवाटर रोबोटिक तकनीक में भारत की आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है।
रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनी जेन टेक्नोलॉजीज ने करगिल विजय दिवस के अवसर पर भारत का पहला स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड मैन-पोर्टेबल एंटी-ड्रोन सिस्टम (एमपीएडीएस) लॉन्च किया है। कंपनी के अनुसार, यह सिस्टम विशेष रूप से पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में दुश्मन के ड्रोनों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए बनाया गया है। इसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित ड्रोन डिटेक्टर और डेटा फ्यूजन एवं कमांड सेंटर लगा है, जिससे ऑपरेटर तुरंत कार्रवाई का निर्णय ले सकते हैं। यह प्रणाली भारत के रक्षा क्षेत्र को मजबूत करेगी और सीमावर्ती सैनिकों को हवाई खतरों से बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगी।
जबलपुर स्थित आर्डनेंस फैक्ट्री खमरिया (ओएफके) भारतीय सेना के लिए स्वदेशी और अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान का एक प्रमुख उत्पादन केंद्र बनने जा रही है। ऑपरेशन सिंदूर में एल-70 एंटी एयरक्राफ्ट गन के प्रभावी प्रदर्शन के बाद यहां उत्पादन को नई गति दी जाएगी। इसमें 120, 220, 450 किलोग्राम और थाउजेंड पाउंडर बमों की नई खेप शामिल है। राफेल और जगुआर जैसे लड़ाकू विमानों के लिए 500 और 1000 किलोग्राम के स्वदेशी जनरल पर्पस एरियल बम, 250 किलोग्राम के बंकर-बख्तरबंद ध्वस्त करने वाले बम और 125 मिमी एफएसएपीडीएस टैंकभेदी गोला-बारूद भी तैयार होगा।
एम्स भोपाल और डीआरडीओ की प्रमुख प्रयोगशाला डीआईपीएएस ने देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों को कठिन परिस्थितियों में अधिक सक्षम और सुरक्षित बनाने के लिए हाथ मिलाया है। यह समझौता स्वदेशी तकनीकों और चिकित्सा समाधानों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे सियाचिन, लद्दाख, ऊंचे पहाड़ों और युद्ध क्षेत्र में तैनात जवानों को सीधा लाभ मिलेगा। शोध में सैनिकों पर अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन और तनाव के प्रभावों का अध्ययन कर ऐसे उपाय विकसित किए जाएंगे, जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़े। परियोजना में पहनने योग्य स्मार्ट उपकरण भी बनाए जाएंगे। यह पहल विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करेगी और इसके लाभ आम मरीजों को भी मिलेंगे।