श्रावण माह की शुरुआत के साथ ही श्री महाकालेश्वर मंदिर में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। मान्यता है कि श्रावण सोमवार व्रत से पाप नष्ट होते हैं और अक्षय पुण्य मिलता है। शाम 5 बजे जलाभिषेक बंद होने के बाद बाबा महाकाल राजा स्वरूप में दर्शन देते हैं। शाम 7 बजे संध्या आरती में दूध का भोग लगता है, जबकि रात 10:20 बजे शयन आरती में मेवे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। मंदिर के पट इसके बाद बंद होते हैं। एक से एक लाख बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष धार्मिक महत्व है। माता सती और पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए श्रावण व्रत किए थे।
सावन माह की शुरुआत के साथ कांवड़ यात्रा प्रारंभ हो गई है, जिसमें लाखों केसरिया वस्त्रधारी कांवड़िए गंगा नदी का पवित्र जल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों और मंदिरों में जलाभिषेक करेंगे। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड सरकारों ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। इस यात्रा का इतिहास पौराणिक काल के समुद्र मंथन से जुड़ा है, जहां भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। रावण, परशुराम और भगवान राम से जुड़ी मान्यताएं भी इस यात्रा के महत्व को दर्शाती हैं, जिसमें विभिन्न जल संग्रहण केंद्रों और प्रमुख मार्गों से भक्त शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं।