मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि केवल अवैध हिरासत की आशंका व्यक्त करने से याचिका स्वीकार्य नहीं होती; याचिकाकर्ता को प्रथमदृष्टया यह दिखाना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में किसी की अवैध हिरासत में है। रिंकू राजपूत द्वारा दायर इस याचिका में पत्नी के लापता होने और पुलिस की निष्क्रियता का आरोप था, लेकिन कोर्ट ने पाया कि अवैध हिरासत का कोई प्रमाण या तथ्य पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने त्वरित जांच के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय भी सुझाए।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बहू और बेटे को कथित अवैध बंधन से मुक्त कराने वाली हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे पारिवारिक विवाद माना और कहा कि तथ्यों को छिपाया गया है। खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के बेटे नीरज की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाए, जिसे पहले 75 प्रतिशत मानसिक दिव्यांग बताया गया था। कोर्ट ने पूछा कि यदि वह अस्वस्थ था तो उसकी शादी क्यों कराई गई और वह पिता कैसे बना। नीरज को न्यायालय में बुलाने पर उसका व्यवहार सामान्य प्रतीत हुआ।