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2026-10-17

उज्जैन की वैश्य टेकरी में 90 साल बाद अशोककालीन संरचनाओं की खोज, मैनिट करेगा रडार से अध्ययन

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

उज्जैन की अशोककालीन वैश्य टेकरी में लगभग 90 साल बाद इतिहास की परतें खोलने की तैयारी की जा रही है। इस अध्ययन में अब मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) भी शामिल होगा।

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मैनिट की रडार तकनीक

मैनिट बिना खोदाई किए जमीन में रडार के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास करेगा कि सतह के नीचे क्या मौजूद है। इससे जमीन में करीब 50 फीट नीचे तक मौजूद ठोस संरचनाओं के संकेत मिलने की उम्मीद है, जिससे आगे कहां और किस हिस्से में खोदाई की जाए, इसकी रूपरेखा तैयार करने में मदद मिलेगी।

वैश्य टेकरी का ऐतिहासिक महत्व

वैश्य टेकरी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि यहां मौजूद स्तूप को सांची के स्तूप से भी बड़ा माना जाता है। यह माना जाता है कि सम्राट अशोक ने उज्जैन के गवर्नर रहने के दौरान अपनी पत्नी देवी की याद में इसे बनवाया था।

पूर्व में हुई खोदाई और प्राप्त सामग्री

पुराने संदर्भों के अनुसार, वर्ष 1938-39 में हुई खोदाई में यहां बड़े आकार की ईंटें और पंच-चिह्नित सिक्के मिले थे। उस समय स्तूप के आधार का व्यास लगभग 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट आंकी गई थी। सांची के मुख्य स्तूप की ऊंचाई करीब 54 फीट है।

ब्रिटिश काल में रुका काम

ब्रिटिश काल में वर्ष 1938 में यहां खोदाई शुरू की गई थी। इस दौरान महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्री सामने आई, लेकिन बाद में गैस के रिसाव के कारण काम रोकना पड़ा।

संरक्षण और खोदाई का प्रस्ताव

अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) भोपाल मंडल ने इसके संरक्षण और खोदाई का प्रस्ताव अपने केंद्रीय कार्यालय को भेजा है। एएसआइ भोपाल मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. शिवाकांत वाजपेयी का कहना है कि खोदाई के बाद ही वास्तविक स्थिति पता चलेगी।

बुद्ध लोक के रूप में विकास की योजना

राज्य सरकार खोदाई के बाद इसे बुद्ध लोक की तरह विकसित करने की तैयारी कर रही है। आयुक्त पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार मदन कुमार नागरगोजे ने बताया कि रडार से अध्ययन के लिए मैनिट के प्रबंधन से बात हुई है। एएसआइ की सहमति मिलने पर यह अध्ययन कराया जाएगा।

ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) की कार्यप्रणाली

ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) को भू-भेदी रडार भी कहा जाता है। यह जमीन खोदे बिना उसके अंदर की संरचना का पता लगाने वाली तकनीक है। रडार यंत्र जमीन की सतह पर चलाया जाता है और उससे विद्युत चुंबकीय तरंगें जमीन के भीतर भेजी जाती हैं।

तरंगों का परावर्तन और विश्लेषण

जमीन के अंदर अलग-अलग पदार्थ, जैसे मिट्टी, पत्थर, ईंट, खाली जगह या दूसरी ठोस संरचनाएं इन तरंगों को अलग-अलग तरीके से परावर्तित करते हैं। रडार इन लौटने वाले संकेतों को दर्ज करता है। कंप्यूटर में इन संकेतों का विश्लेषण करने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस स्थान पर जमीन के नीचे कोई संरचना है और वह लगभग कितनी गहराई पर है।

उज्जैन के इतिहास की वैज्ञानिक जांच

पुरातत्व विभाग उज्जैन के 4000 साल पुराने इतिहास को खंगालेगा। इसके तहत वैश्य टेकरी, दंगवाड़ा समेत कई जगहों की वैज्ञानिक जांच की जाएगी।