बुलंद सोच, भोपाल।
यह इतिहास में दर्ज है कि बहुत कम शहर ऐसे हैं जिन्होंने महीनों तक दुश्मनों की घेराबंदी झेली और फिर भी वे झुके नहीं। भोपाल की यह गाथा दर्शाती है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके किले नहीं, बल्कि उसके लोग थे। यह उस दौर की कहानी है जब भोपाल अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा था। चारों ओर दुश्मन की सेनाओं का घेरा था, साधन सीमित थे और रियासत का बच पाना लगभग असंभव प्रतीत हो रहा था। परंतु अगले नौ महीनों में भोपाल ने ऐसा इतिहास रचा जो आज भी साहस और जन-एकता की मिसाल माना जाता है।
नवंबर 1813 की घेराबंदी
नवंबर 1813 में ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया के सेनापति जीन बैप्टिस्ट और जसवंत राव भाव ने नागपुर के भोंसले की सेना के साथ मिलकर भोपाल को घेर लिया। हमलावर सेनाओं ने इस्लामनगर और इस्लामगढ़ में अपने डेरे डाले।
वजीर मोहम्मद खान का नेतृत्व और जन-सहयोग
इस संकट की घड़ी में भोपाल की रक्षा की कमान वजीर नवाब मोहम्मद खान ने संभाली। उन्होंने मुकाबला करने का निर्णय लिया और पूरे शहर का मनोबल बनाए रखा। धीरे-धीरे यह लड़ाई पूरे भोपाल की बन गई। कोई किले की दीवारें मजबूत कर रहा था, तो कोई रसद पहुंचा रहा था। कोई मोर्चे पर सैनिकों के साथ खड़ा था। जब दुश्मन शहर की दीवारें तोड़ने लगा, तब वजीर मोहम्मद खान के आह्वान पर कुलीन परिवारों की पर्दानशीन महिलाएं भी किले की बुर्जों पर पहुंच गईं। उन्होंने बारूद से भरे घड़ों में आग लगाकर दुश्मन पर बरसाना प्रारंभ कर दिया।
नौ माह बाद घेराबंदी समाप्त
लगभग नौ महीने तक घेराबंदी जारी रही। संख्या और संसाधनों में कहीं अधिक मजबूत होने के बावजूद हमलावर सेना भोपाल का हौसला नहीं तोड़ सकी। आखिरकार जुलाई 1814 में उन्हें घेराबंदी हटाकर वापस लौटना पड़ा।
फतेहगढ़ किला: इतिहास और वर्तमान
आज जहां हमीदिया अस्पताल स्थित है, वहां फतेहगढ़ किला विशाल बुर्जों से घिरा हुआ था। फतेहगढ़ का यह किला मजबूत दीवारों और विशाल बुर्जों से घिरा था। सिंधिया सेना के आक्रमण के दौरान नवाब ने इसे मुख्य सुरक्षा केंद्र बनाया। भीषण तोपखानों के हमलों को झेलकर भी यह किला अजेय रहा। इसके परिसर में दोस्त मोहम्मद खान द्वारा निर्मित एशिया की सबसे छोटी ‘ढाई सीढ़ी की मस्जिद’ थी। वर्तमान में यह ऐतिहासिक किला पूरी तरह से ‘हमीदिया अस्पताल’ और ‘गांधी मेडिकल कॉलेज’ का परिसर बन चुका है। आधुनिक बहुमंजिला चिकित्सा इमारतों के निर्माण के कारण किले का आंतरिक मूल ढांचा अब गायब हो गया है। वीआईपी रोड से किले की बाहरी प्राचीरें दिखाई देती हैं।

