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2026-08-12

दतिया भाजपा में नए जिलाध्यक्ष की तलाश तेज, 2028 विधानसभा चुनाव से जुड़ा फैसला

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में बदलाव की कवायद तेज हो गई है। पार्टी ने जिला कार्यकारिणी भंग कर दी है।
नए जिलाध्यक्ष के चयन को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। इस पद के लिए प्रमुख रूप से आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम चर्चा में हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, दतिया में अब नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को संगठन के महत्वपूर्ण पदों से दूर रखने की रणनीति अपनाई जा रही है। उपचुनाव में हार के बाद जिला कार्यकारिणी भंग करना इसी बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।
हालांकि, अभी तक जिले के किसी पदाधिकारी को निलंबित या पार्टी से बाहर नहीं किया गया है। यह संकेत देता है कि पार्टी सामूहिक रूप से संगठन में बदलाव कर रही है।
नए जिलाध्यक्ष के चयन में भी नरोत्तम मिश्रा विरोधी खेमे के चेहरे को प्राथमिकता मिलने की चर्चा है।

जिलाध्यक्ष पद के दावेदार और 2028 का गणित

आशुतोष तिवारी को संगठन के करीबी और सक्रिय नेता के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनके सामने 2028 के विधानसभा चुनाव की टिकट का सवाल भी है।
यदि वह जिलाध्यक्ष बनते हैं, तो अगले डेढ़ से दो साल संगठन खड़ा करने और नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी व उन्हें लड़ने में निकल जाएंगे। इसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
ऐसे में जिलाध्यक्ष रहते हुए खुद टिकट के दावेदार बने रहना उनके लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि संगठन जिलाध्यक्ष से चुनाव जिताने की भी उम्मीद करता है।
इस स्थिति में तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष का पद और 2028 की विधानसभा टिकट में से एक चुनने जैसी चुनौती आ सकती है।
पूर्व विधायक और प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम पर भी जिलाध्यक्ष पद के लिए चर्चा है। वह भांडेर विधानसभा सीट से फिर टिकट के दावेदार हैं।
जिलाध्यक्ष बनने पर उनके सामने भी 2028 की टिकट को लेकर यही चुनौती होगी, जैसी आशुतोष तिवारी के सामने है।
पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव से अलग संगठन को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक समीकरण भी साध सके।

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सामाजिक समीकरणों पर पार्टी का जोर

आशुतोष तिवारी के नाम के साथ नरोत्तम मिश्रा के बाद ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग के समीकरण को साधने की संभावना देखी जा रही है।
वहीं, घनश्याम पिरोनिया के जरिए दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश हो सकती है।
उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत के बाद भाजपा के लिए दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण महत्वपूर्ण हो गया है। पार्टी 2028 से पहले इन सामाजिक समीकरणों को मजबूत करना चाहती है।
दूसरी ओर, जिला अध्यक्ष पद से रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद कुशवाह समाज का समीकरण भी एक चुनौती है।
रघुवीर कुशवाह ने कहा है कि चुनाव से पहले इस्तीफा देने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं हुई और चुनाव में पूरी मेहनत से काम करने के बावजूद पार्टी की हार का ठीकरा अब उन पर फोड़ा जा रहा है।
दतिया में करीब 35 हजार कुशवाह मतदाता बताए जाते हैं, ऐसे में पार्टी इस समाज को नाराज नहीं करना चाहेगी।
पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र में कुशवाह समाज की नाराजगी को भी नरोत्तम मिश्रा की हार के कारणों में गिना गया था। इसके बाद ही रघुवीर कुशवाह को ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से जिला अध्यक्ष बनाया गया था।

निकाय चुनाव से पहले संगठनात्मक चुनौती

भाजपा ने पूरे जिले की संगठनात्मक संरचना भंग कर दी है, जिससे दतिया के साथ सेवढ़ा और भांडेर में भी संगठन अब सक्रिय नहीं है।
अगले साल नगरीय निकाय चुनाव प्रस्तावित हैं और पार्टी नहीं चाहती कि संगठन में लंबे समय तक चलने वाली खींचतान का असर इन चुनावों पर पड़े।
इसलिए जिलाध्यक्ष के चयन में जातीय समीकरण, गुटीय संतुलन, 2028 की टिकट और आगामी निकाय चुनाव, इन चारों पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है।