बुलंद सोच, इंदौर।

इंदौर में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA) के संयुक्त तत्वावधान में वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य न्याय व्यवस्था को अधिक सर्वसमावेशी और सुलभ बनाना था, जिसमें विशेष रूप से मूक-बधिर और दृष्टिबाधित लोगों को न्यायिक व्यवस्था और विधिक सहायता योजनाओं से जोड़ने पर जोर दिया गया।
कॉन्फ्रेंस में आनंद सर्विस सोसाइटी के मूक-बधिर बच्चों और अन्य संस्थाओं से जुड़े दिव्यांग बच्चों ने अतिथियों का स्वागत अपने हाथों से तैयार किए गए ग्रीटिंग कार्ड और पौधे भेंट कर किया। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बच्चों की इस पहल की सराहना की, इसे आयोजन की संवेदनशील और कल्पनाशील पहल बताते हुए बच्चों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल में कानूनी जानकारी
न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए, NALSA की विभिन्न योजनाओं और विधिक सेवाओं की जानकारी को ब्रेल लिपि में तैयार किया गया है। कॉन्फ्रेंस में इस विशेष गाइड ‘स्पर्श’ (SPARSH) का विमोचन किया गया, जिससे दृष्टिबाधित व्यक्ति अब कानूनी सहायता से जुड़ी जानकारी दूसरों पर निर्भर हुए बिना अपनी सुविधा के अनुसार प्राप्त कर सकेंगे। जानकारी तक पहुंच के बाद ही न्याय तक पहुंच का रास्ता और आसान होगा।

मूक-बधिरों के लिए सांकेतिक भाषा अनुवाद
मूक-बधिर प्रतिभागियों को सम्मेलन से जोड़े रखने के लिए, पूरे कार्यक्रम के संवाद का लाइव भारतीय सांकेतिक भाषा (Indian Sign Language) में अनुवाद किया गया। सांकेतिक भाषा विशेषज्ञों अक्षय सोनी और खुशी डोंगरे ने मंच पर होने वाली बातचीत और संबोधनों को सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत किया, जिससे मूक-बधिर प्रतिभागी हर महत्वपूर्ण बात को समझ सके।
कॉन्फ्रेंस में NALSA के थीम सॉन्ग को भी भारतीय सांकेतिक भाषा में जारी किया गया। यह संदेश महत्वपूर्ण था कि समावेशन केवल मंच पर मौजूद रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को पूरी प्रक्रिया समझने और उसमें बराबरी से भाग लेने का अवसर देना भी जरूरी है।
सांस्कृतिक प्रस्तुति और सामुदायिक मध्यस्थता
आनंद सर्विस सोसाइटी के मूक-बधिर बच्चों और अन्य संस्थाओं के दिव्यांग बच्चों ने ‘द सिम्फनी ऑफ होप’ नाम से एक सांस्कृतिक प्रस्तुति दी, जिसने कार्यक्रम में मौजूद न्यायाधीशों, अधिकारियों और अतिथियों को भावुक कर दिया। इस पहल में आनंद सर्विस सोसाइटी के ज्ञानेन्द्र पुरोहित और मोनिका पुरोहित की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनकी देखरेख में बच्चों ने अपनी प्रतिभा के जरिए यह संदेश दिया कि शारीरिक अक्षमता प्रतिभा, संवेदनशीलता और सपनों के रास्ते में बाधा नहीं है।
कॉन्फ्रेंस में न्याय तक पहुंच के एक दूसरे महत्वपूर्ण पहलू, सामुदायिक मध्यस्थता (Community Mediation) की सफलता भी साझा की गई। NALSA और मध्यप्रदेश SALSA की पहल पर शुरू की गई 40 घंटे की कम्युनिटी मेडिएशन ट्रेनिंग का उद्देश्य समुदाय स्तर पर विवादों को संवाद, समझ और आपसी सहमति के माध्यम से सुलझाने के लिए प्रशिक्षित लोगों को तैयार करना है।
कम्युनिटी मेडिएशन से जुड़े अपने अनुभव में अतुल राठौर ने बताया कि ज्ञानेन्द्र पुरोहित के मार्गदर्शन और सहयोग से उन्होंने मूक-बधिरों से जुड़े दो जटिल मामलों को आपसी समझ और मध्यस्थता के जरिए सुलझाने में सफलता हासिल की। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मूक-बधिर व्यक्ति की बात को समझने और दोनों पक्षों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करने में सामान्य मध्यस्थता की तुलना में अतिरिक्त संवेदनशीलता और विशेष कौशल की जरूरत होती है।
मध्यस्थता की इस पहल से लाभान्वित पूजा गुप्ता और दीपक गुप्ता ने न्यायपालिका और संबंधित संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि मूक-बधिरों से जुड़ा यह पहला ऐसा मामला था, जो मध्यस्थता के माध्यम से इतनी सहजता से सुलझ सका। उनके लिए यह सिर्फ एक कानूनी विवाद का समाधान नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था का अनुभव था, जिसमें उनकी बात को समझने, सुनने और समाधान तक पहुंचाने के लिए न्यायिक तंत्र ने उनके अनुरूप रास्ता तैयार किया।

समान न्याय की अवधारणा
संविधान का मूल दर्शन हर व्यक्ति को समानता और न्याय का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में समान न्याय तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को न्याय व्यवस्था तक पहुंचने के लिए आवश्यक साधन और सुविधाएं भी मिलें। दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए ब्रेल में जानकारी, मूक-बधिर व्यक्ति के लिए सांकेतिक भाषा में संवाद और विशेष जरूरत वाले लोगों के लिए संवेदनशील विधिक सहायता, ये सभी कदम इसी व्यापक कानूनी अवधारणा को व्यवहार में उतारते हैं। यानी समान न्याय का अर्थ हर व्यक्ति के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना ही नहीं, बल्कि उसकी जरूरत के अनुसार ऐसी सुविधा उपलब्ध कराना भी है, जिससे वह न्याय की प्रक्रिया में बराबरी से शामिल हो सके।
इस कॉन्फ्रेंस की सबसे महत्वपूर्ण सीख यही रही कि न्याय केवल कोर्ट का फैसला नहीं है। न्याय तक पहुंचने के लिए जानकारी, संवाद, सम्मान और विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं। इंदौर का यह आयोजन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ गया कि न्याय के दरवाजे पर पहुंचने के लिए किसी व्यक्ति को अपनी भाषा, अपनी पहचान या अपनी शारीरिक क्षमता बदलने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न्याय व्यवस्था को ही उसके करीब पहुंचना होगा।

