बुलंद सोच, जबलपुर।

हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट किया है कि लंबित मामलों के निपटारे में देरी का एकमात्र कारण अनावश्यक स्थगन नहीं है। न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों की कमी के साथ-साथ न्यायालय कक्षों, आधारभूत सुविधाओं, मंत्रालयीन कर्मचारियों और रिक्त पदों की समस्या भी मामलों के निपटारे को प्रभावित कर रही है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक लालवानी ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायदृष्टांतों का हवाला देते हुए कई दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की। उन्होंने अनावश्यक स्थगन, झूठे दावों, गलत दस्तावेजों एवं शपथ-पत्रों और बेबुनियाद मुकदमेबाजी पर प्रभावी रोक लगाने की बात कही। इसके अतिरिक्त, दोषी पक्ष पर वास्तविक लागत और हर्जाना लगाने संबंधी दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई।
प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। इस कारण अंतरिम आवेदनों अथवा स्थगन के संबंध में कोई ऐसा निश्चित नियम या मानक प्रक्रिया नहीं बनाई जा सकती, जो हर मामले में समान रूप से लागू हो सके।
दीवानी मुकदमे में किसी भी आवेदन पर निर्णय लेने से पहले संबंधित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को न्यायालय कक्षों, आधारभूत सुविधाओं, मंत्रालयीन कर्मचारियों और न्यायाधीशों की कमी के संबंध में आवश्यक कदम उठाने चाहिए। व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने का कोई आधार न पाते हुए खंडपीठ ने इस जनहित याचिका का पटाक्षेप कर दिया।

