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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 35 हजार से अधिक अवमानना केस लंबित, निराकरण में चुनौती बढ़ी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, जबलपुर।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक मुकदमे का आदेश होने के बावजूद विवाद समाप्त नहीं हो रहा है। आदेश का पालन न होने पर संबंधित पक्षकार दोबारा हाई कोर्ट का रुख कर रहे हैं, जिससे अवमानना याचिका के रूप में उसी विवाद की एक नई न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

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न्यायालय के समक्ष 35 हजार से अधिक अवमानना प्रकरणों की संख्या ने लंबित मामलों के निराकरण की चुनौती को और अधिक जटिल बना दिया है।

मूल याचिका में न्यायालय अधिकार और विवाद पर निर्णय देता है, जबकि आदेश के बाद अवमानना याचिका में यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित विभाग, अधिकारी या संस्था ने न्यायालय के निर्देश का पालन किया है अथवा नहीं।

इस प्रक्रिया के तहत नोटिस जारी करना, जवाब तलब करना, अनुपालन रिपोर्ट मांगना, व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करना और कई बार समय-सीमा निर्धारित करना जैसी न्यायिक कार्रवाइयां करनी पड़ती हैं।

न्यायालय पर अतिरिक्त बोझ

हाई कोर्ट पर पहले से ही लंबित मामलों का एक बड़ा बोझ है।

मार्च 2025 के अंत तक न्यायालय में लंबित प्रकरणों की संख्या 4.71 लाख से अधिक दर्ज की गई थी।

आदेशों का समय पर पालन न होने के कारण उत्पन्न होने वाले अवमानना प्रकरण न्यायालय के अतिरिक्त समय और संसाधनों की मांग करते हैं, जिससे मूल मामलों के निराकरण की गति सीधे तौर पर प्रभावित होती है।

अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख

हाल के कई मामलों में न्यायालय को अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना पड़ा है।

कई प्रकरणों में न्यायालय के आदेश के बावजूद अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत न होने अथवा संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति न होने पर न्यायालय ने नोटिस जारी करने से आगे बढ़कर वारंट तक जारी किए हैं।

सितंबर माह में जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने एक अवमानना प्रकरण के संबंध में तत्कालीन प्रमुख सचिव राजस्व और सागर के तत्कालीन कलेक्टर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे।

समाधान की आवश्यकता

अवमानना कानून का मुख्य उद्देश्य न्यायालय के आदेशों की गरिमा और प्रभावशीलता को बनाए रखना है, जिसके कारण अवमानना याचिकाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है।

वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय की बार-बार निगरानी की आवश्यकता पड़ती है।

यदि विभागीय स्तर पर आदेश प्राप्त होते ही उसकी अनुपालन प्रक्रिया तत्काल शुरू हो जाए और निर्धारित समय-सीमा के भीतर अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दी जाए, तो बड़ी संख्या में अवमानना याचिकाओं की स्थिति को टाला जा सकता है।