बुलंद सोच, भोपाल।
नवाब हमीदुल्ला खान दिल्ली में कायदे-आजम जिन्ना से मिलने और अपने तथा भोपाल राज्य के भविष्य के बारे में उनका मार्गदर्शन लेने आए थे। उन्होंने जिन्ना को एक पत्र लिखकर उन बातों का उल्लेख किया, जिन पर उन्हें आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने थे।
पाकिस्तान के गठन में भूमिका
नवाब हमीदुल्ला ने पिछले आठ-दस वर्षों से पाकिस्तान के उद्देश्य का निष्ठापूर्वक समर्थन किया था। उन्होंने पूरी कोशिश की कि भारत की देशी रियासतें पाकिस्तान के गठन में बाधा न बनें। लगातार कई दिनों और रातों के अथक प्रयासों के बाद, 29 मार्च को वे इस दिशा में सफल रहे और अधिकांश हिंदू रियासतों को संविधान सभा से दूर रखने में भूमिका निभाई। पाकिस्तान बनने के बाद उनका यह कार्य समाप्त हो गया।
भोपाल की स्थिति और समर्थन का अभाव
नवाब ने अब अपने स्तर पर भोपाल सहित मुस्लिम रियासतों की स्वतंत्रता बनाए रखने का दायित्व लिया था। हालांकि, उन्हें किसी भी हिंदू शासक का सहयोग नहीं मिला और उन पर विश्वास नहीं किया गया। जिस एक मित्र से उन्हें आशा थी, उन्होंने भी साथ छोड़ दिया। नवाब ने बताया कि भोपाल की लगभग 80% आबादी हिंदू है, यह भारत के बीचो-बीच स्थित है और चारों ओर उनके विरोधी हैं।
पाकिस्तान से सहायता और भारत के दबाव पर चिंता
नवाब ने उल्लेख किया कि पाकिस्तान कोई प्रत्यक्ष सहायता नहीं कर सकता और वे ऐसी कोई स्थिति नहीं बनने देंगे, जिससे वह भारत के साथ संघर्ष में उलझे। उन्होंने कहा कि इंग्लैंड पहले ही उन्हें निराश कर चुका है। भारत चाहे तो कोयला, पेट्रोल, मशीनरी, हथियार और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोककर उन्हें पूरी तरह दबाव में ला सकता है। भारत ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ देने से भी इनकार करने की धमकी दे रहा था। नवाब ने कहा कि वे भयभीत नहीं हैं और अंत तक डटे रहेंगे।
सहायता की शर्तें और विलय पर रुख
नवाब हमीदुल्ला ने जिन्ना से स्पष्टीकरण मांगा कि पाकिस्तान उनकी सहायता किस प्रकार करेगा। उन्होंने पूछा कि यदि पाकिस्तान के साथ संधि, विलय या अन्य समझौता होता है, तो उसकी शर्तें क्या होंगी और उन्हें कैसे लागू किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी स्थिति में भारत में विलय (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि ऐसा कभी करना भी पड़ा, तो वह केवल उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत इच्छा और भविष्य की योजना
नवाब की व्यक्तिगत इच्छा सिंहासन छोड़कर इस्लाम और पाकिस्तान की सेवा करने की थी। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें पाकिस्तान की किसी भूमिका में सेवा करने का अवसर मिले, तो वे उसे अपना सौभाग्य मानेंगे। उन्होंने जिन्ना से पूछा कि यदि उन्हें उनकी जरूरत नहीं है या उनका पाकिस्तान आना असुविधाजनक है, तो उन्हें स्पष्ट रूप से बता दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पाकिस्तान में उनके लिए कोई स्थान नहीं है, तो उन्हें भारत छोड़कर कहीं और रहने की तैयारी करनी होगी।
पत्र का स्रोत
यह पत्र ‘जिन्ना पेपर्स’ Vol. IV’ में दर्ज है, जिसे पाकिस्तान सरकार ने प्रकाशित किया था।

