बुलंद सोच, ग्वालियर।

27 वर्षीय रेखा बाथम, जो स्वयं कभी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं, अब असाक्षर पुरुषों और महिलाओं को अक्षर ज्ञान प्रदान कर रही हैं। अपनी जीविका चलाने के लिए घरों में काम करने वाली रेखा के लिए यह आश्चर्य से कम नहीं है कि वह दूसरों की शिक्षिका बन गई हैं।
रेखा को अक्सर अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते समय उनकी शिक्षा के स्तर और बच्चों को पढ़ाने की क्षमता के बारे में पूछा जाता था। असाक्षर होने के कारण उन्हें चिंता हुई कि यह स्थिति बच्चों के लिए भविष्य में परेशानी खड़ी कर सकती है और समाज में बिना पढ़े-लिखे काम कैसे चलेगा। स्कूल की शिक्षिकाओं की प्रेरणा से रेखा ने तुरंत पढ़ना-लिखना सीखने का निश्चय किया।
रेखा ने स्वयं 2025 में अक्षर ज्ञान सीखा।
ग्वालियर की कोटेश्वर कॉलोनी निवासी 27 वर्षीय रेखा बाथम ने बताया कि 2021 में बीमारी के कारण उनके पति की मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद उनके कंधों पर दो बच्चों का पूरा बोझ आ गया था। अशिक्षित रेखा के लिए यह जिम्मेदारी एक पहाड़ के समान थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने काम करना शुरू किया और बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल भेजा। बच्चों को स्कूल भेजने के दौरान ही एक दिन उन्हें पढ़ने-लिखने की आवश्यकता का अहसास हुआ। इसके अतिरिक्त, मेडिकल की दुकान से लेकर डॉक्टर के बोर्ड और सार्वजनिक स्थलों पर लिखी जानकारी को पढ़ने में असमर्थता के कारण उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ती थी। धीरे-धीरे इन परेशानियों ने उन्हें साक्षर बनने के लिए एक नए प्रयास को जन्म दिया।
रेखा सप्ताह में दो कक्षाएं लेती हैं, जो शनिवार और रविवार को होती हैं। ये कक्षाएं सरकारी स्कूल किलागेट पर लगती हैं, और घर के पास होने के कारण रेखा प्रत्येक कक्षा में उपस्थित रहती हैं। रेखा का कहना है कि अक्षर ज्ञान सरल है और जो लोग झिझकते हैं, उन्हें ऐसा न सोचकर तुरंत सीखने के लिए आगे आना चाहिए।
रेखा अब तक 100 से अधिक लोगों को पढ़ा चुकी हैं। ग्वालियर की जिला साक्षरता अधिकारी अनुपमा जैन ने बताया कि उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत लोगों को लगातार साक्षर बनाने का काम किया जा रहा है। अब महिलाएं और पुरुष भी कक्षाओं में अक्षर ज्ञान के लिए आ रहे हैं, जिससे उन्हें अपने दैनिक कार्यों में काफी मदद मिलती है।

