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2026-07-31

बॉम्बे हाईकोर्ट ने SDPI नेताओं को दी राहत, तड़ीपार आदेश रद्द; कहा- ‘बाबरी मस्जिद को नहीं गिराना चाहिए था’ कहना राष्ट्रविरोधी नहीं

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, मुंबई।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के दो पदाधिकारियों को इलाके से बाहर करने के मुंबई पुलिस के आदेशों को रद्द कर दिया। इन आदेशों के तहत दोनों लोगों को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने को कहा गया था। यह मामला फिरोज अब्दुल खान बनाम महाराष्ट्र सरकार और अन्य से जुड़ा था।

जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी प्राथमिकी के आधार पर दोनों लोगों के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं लगते। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि ऐसा तब है, जब इन्हीं प्रदर्शनों में अन्य राजनीतिक दलों ने भी हिस्सा लिया था।

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कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कार्रवाई चुनिंदा तरीके से की गई लगती है और दोनों याचिकाकर्ताओं के मुस्लिम समुदाय से होने के कारण प्रभावित हो सकती है।

जज ने कहा कि प्राथमिकी सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ है, लेकिन केवल इन याचिकाकर्ताओं को निशाना बनाया गया। उन्होंने आगे कहा कि कार्रवाई चुनिंदा तरीके से नहीं की जा सकती। जज ने पूछा, “क्या आपने कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की है? सिर्फ इसलिए कि वे एक धर्म से जुड़े हैं?”

कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘अयोध्या में बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था’, ऐसा विचार रखना राष्ट्रविरोधी नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी भी नागरिक को इस मुद्दे पर अपनी राय रखने का अधिकार है।

याचिकाकर्ता फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंी ने 3 दिसंबर 2025 को जारी तड़ीपार आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उन्हें एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने को कहा गया था।

ये आदेश 2024 और 2025 में दर्ज तीन प्राथमिकियों के आधार पर जारी किए गए थे। इनमें वक्फ विधेयक को लेकर हुए प्रदर्शन, चेंबूर-गोवंडी में सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण और बाबरी मस्जिद मुद्दे से जुड़े विरोध प्रदर्शन शामिल थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील इब्राहिम हरबत ने दलील दी कि कथित घटनाओं में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 लागू करने जैसी कोई स्थिति नहीं बनती। इस धारा के तहत तभी तड़ीपार की कार्रवाई की जा सकती है, जब यह दिखाने के लिए ठोस आधार हो कि व्यक्ति से लोगों या संपत्ति को खतरा पहुंचाने वाले अपराध होने की आशंका है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने कहा कि प्राथमिकियों में केवल नारेबाजी का जिक्र है। इनमें किसी व्यक्ति या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की बात नहीं कही गई है।

जज ने बाबरी मस्जिद मुद्दे से जुड़े प्रदर्शन को आधार बनाने पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि यह कहना कि मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, “बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, यह उनकी सोच है। यह राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकता है? यह राष्ट्रविरोधी नहीं हो सकता। यह उनकी धारणा है। हर किसी को अधिकार है।”

मुख्य सरकारी वकील शिशिर हिरे ने आरोपियों के प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से कथित संबंधों का जिक्र किया, जिसे आरोपियों ने खारिज किया।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ये आरोप कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं थे, इसलिए इन्हें आधार नहीं बनाया जा सकता।

हिरे ने आगे दलील दी कि प्रदर्शन के दौरान याचिकाकर्ताओं के व्यवहार से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और शांति भंग हो सकती है।

लेकिन कोर्ट ने कहा कि केवल आशंकाओं के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने मौलिक अधिकारों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “जहां तक मौलिक अधिकारों का सवाल है, इसमें छिपे अर्थ निकालने की जरूरत नहीं है। मौलिक अधिकार मौजूद हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों को इस तरह कैसे प्रभावित किया जा सकता है?”

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि किसी व्यक्ति को क्षेत्र से बाहर करने की कार्रवाई एक असाधारण कदम है, क्योंकि इससे लोगों के स्वतंत्र आवागमन के मौलिक अधिकार पर असर पड़ता है। इसलिए ऐसी कार्रवाई कानून में तय नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि जिन अपराधों की जांच अभी चल रही है, उन्हें ऐसी कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने एसडीपीआई के अन्य सदस्यों को इसी तरह के मामलों में दी गई राहत वाले अपने पुराने आदेश का भी हवाला दिया।

जस्टिस जामदार ने पहले एक एसडीपीआई पदाधिकारी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश रद्द किया था। उन्होंने कहा था कि ऐसी कार्रवाई व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है और केवल सरकार के फैसलों के विरोध के आधार पर नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में भी तड़ीपार आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं और उन्हें रद्द कर दिया।