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2026-07-24

‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ को दैनिक भास्कर से 3 स्टार, रिश्तों और अकेलेपन की संवेदनशील कहानी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ परिवार, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित एक धीमी रफ्तार लेकिन दिल छू लेने वाली कहानी प्रस्तुत करती है। फिल्म में हायाओ म्याऊजाकी की फिल्मों की गर्मजोशी और बिल्लियों के प्रति प्रेम की झलक महसूस होती है।
इस फिल्म की अवधि 2 घंटे 18 मिनट है और दैनिक भास्कर ने इसे 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है।
कहानी की शुरुआत मैक्स (सिद्धार्थ मेनन) और उसकी गर्लफ्रेंड मिन (मेधा शंकर) के ब्रेकअप से होती है। वे कभी हायाओ मियाजाकी की फिल्मों से जुड़े थे, लेकिन अब उनका रिश्ता समाप्त हो चुका है।
उनके बीच अब केवल उनकी पालतू बिल्ली म्याऊजाकी का रिश्ता बचा है। मिन कुछ समय के लिए बिल्ली को मैक्स के पास छोड़ देती है, हालांकि जानवरों के बालों से एलर्जी के कारण मैक्स उसे रखने के लिए तैयार नहीं होता है।
धीरे-धीरे यही बिल्ली दोनों की जिंदगी में फिर से भावनात्मक जुड़ाव का कारण बनती है।
यह केवल ब्रेकअप की कहानी नहीं है; मैक्स अपनी मां वसुधा की कैंसर से हुई मौत के सदमे से उबरने का प्रयास कर रहा है।
दूसरी ओर, उसके पिता रमेश पत्नी के जाने के बाद अकेलेपन, अपराधबोध और अंदरूनी संघर्ष से जूझ रहे हैं।
कहानी तीन पीढ़ियों की भावनात्मक उलझनों को जोड़ती है, जिसमें मैक्स के दादा श्रीधर महादेवन नर्सिंग होम में जीवन को एक नए नजरिए से देखते हैं।
जेनिफर सेक्वेरा और कैरोल जैसे किरदार यह दर्शाते हैं कि उम्र चाहे कोई भी हो, इंसान को हमेशा अपनापन और प्यार की आवश्यकता होती है।
फिल्म रिश्तों के टूटने, माता-पिता और बच्चों की बढ़ती दूरियों, मानसिक स्वास्थ्य, थेरेपी, अकेलेपन, इस्लामोफोबिया, लैंगिक भूमिकाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे कई सामाजिक मुद्दों को बिना किसी उपदेश के स्वाभाविक ढंग से कहानी में पिरोती है।
हालांकि, कई सब-प्लॉट के कारण फिल्म कुछ जगहों पर बिखरी हुई और आवश्यकता से अधिक लंबी प्रतीत होती है।

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कलाकारों का अभिनय

सिद्धार्थ मेनन ने मैक्स के किरदार में एक टूटे हुए इंसान की भावनाओं को ईमानदारी से प्रस्तुत किया है। वे मां की मौत और रिश्ते के खत्म होने के बाद की उथल-पुथल को प्रभावी ढंग से स्क्रीन पर लाते हैं।
मेधा शंकर ने मिन के किरदार में संयमित अभिनय किया है, और ज्यादा ड्रामेटिक दृश्य न होने के बावजूद वे किरदार को सहज बनाए रखती हैं।
फिल्म की सबसे मजबूत परफॉर्मेंस आदिल हुसैन की है, जिन्होंने रमेश महादेवन के रूप में अपराधबोध, अकेलेपन और आत्मस्वीकृति के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। खासकर थेरेपी वाले दृश्य और बेटे मैक्स के साथ उनके भावुक संवाद यादगार रहते हैं।
नासर ने श्रीधर महादेवन का किरदार निभाया है और वे सीमित स्क्रीन टाइम में भी अपना असर छोड़ते हैं, उनकी मौजूदगी फिल्म में अनुभव और भावनात्मक गहराई जोड़ती है।
नफीसा अली जेनिफर सेक्वेरा के रूप में गरिमा और संवेदनशीलता लाती हैं, जबकि विदात्री बंदी कैरोल के किरदार में सहजता और जीवन से थकी लेकिन सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित करती हैं।
मंदिरा बेदी धारा के किरदार में कहानी को संतुलन प्रदान करती हैं; हालांकि उनका रोल छोटा है, फिर भी वे प्रभाव छोड़ती हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति ने भावनात्मक विषयों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं, जिन्हें पर्याप्त समय मिला है।
हालांकि, इसी वजह से फिल्म कई जगह आवश्यकता से अधिक फैली हुई महसूस होती है।
सिनेमैटोग्राफी साधारण लेकिन प्रभावी है, और कैमरा पात्रों की भावनाओं पर केंद्रित रहता है।
प्रोडक्शन डिजाइन मजबूत है; मैक्स का आधुनिक अपार्टमेंट, स्टूडियो घिबली के पोस्टर और कैरोल का बोहेमियन घर किरदारों की मानसिक दुनिया को दर्शाते हैं।
कॉस्ट्यूम डिजाइन किरदारों के व्यक्तित्व के अनुरूप है और छोटे-छोटे विजुअल डिटेल्स फिल्म को वास्तविक बनाते हैं।
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शांत और भावनात्मक है, जो कहानी पर हावी होने की बजाय उसका मूड बेहतर बनाता है; कहीं भी आवश्यकता से अधिक शोर या मेलोड्रामा नहीं है। हालांकि कोई गाना लंबे समय तक याद नहीं रह जाता।

फिल्म की कमज़ोरियाँ और निष्कर्ष

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी 2 घंटे 18 मिनट की लंबी अवधि है। कई दृश्य और सब-प्लॉट छोटे किए जा सकते थे।
कुछ जगहों पर भावुक संवाद लंबे लगते हैं और फिल्म की गति धीमी पड़ जाती है। कुछ कलाकारों का अभिनय निर्देशक की सोच के अनुरूप पूरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
कई गंभीर विषयों को एक साथ शामिल करने से कहानी कुछ हिस्सों में बिखरी हुई लगती है।
यदि दर्शकों को तेज रफ्तार मसाला फिल्में पसंद हैं, तो ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ धीमी लग सकती है।
लेकिन रिश्तों, परिवार, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित संवेदनशील कहानियां पसंद करने वालों को यह फिल्म पसंद आ सकती है।
यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा इंसानी भावनाओं को समझने और महसूस करने का अनुभव देती है।
इसकी लंबी लेंथ एक कमजोरी है, लेकिन इसकी ईमानदार कहानी और आदिल हुसैन का दमदार अभिनय इसे एक बार देखने लायक बनाते हैं।