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2026-08-10

रामघाट पर शिप्रा आरती को लेकर विवाद, महाकाल समिति के बटुकों ने संभाली जिम्मेदारी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, उज्जैन।

उज्जैन के रामघाट पर दैनिक शिप्रा आरती को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है। शुक्रवार शाम को प्रशासन और तीर्थ पुरोहितों के बीच इस मुद्दे पर गतिरोध की स्थिति बनी।

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लगभग 11 वर्षों से तीर्थ पुरोहित शिप्रा नदी के किनारे पूजा-पाठ और आरती कराते आ रहे हैं। अब महाकाल मंदिर समिति ने आरती की जिम्मेदारी मंदिर के बटुकों को सौंप दी है, जिसका तीर्थ पुरोहित विरोध कर रहे हैं।

शुक्रवार शाम का घटनाक्रम

शुक्रवार शाम को महाकाल मंदिर समिति के बटुक रामघाट पर आरती करने पहुँचे तो पंडा समिति के पुरोहितों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। विवाद की आशंका के मद्देनजर एसडीएम एलएन गर्ग, पवन बारिया और महाकाल थाना पुलिस का बल पहले से ही घाट पर मौजूद था।

एसडीएम ने पुरोहितों को समझाने का प्रयास किया, परंतु वे आरती नहीं होने देने की बात पर अड़े रहे। लगभग आधे घंटे तक विवाद की स्थिति बनी रही।

इसके बाद पुलिस ने पुरोहितों को घाट से हटाया और महाकाल मंदिर समिति के बटुकों द्वारा आरती कराई गई।

नई आरती की शुरुआत

श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति ने गुरुवार शाम को रामघाट के समीप शिप्रा आरती की शुरुआत की थी। मंदिर समिति द्वारा संचालित श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण व शोध संस्थान के 21 विद्यार्थियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आरती संपन्न की।

प्रशासन का पक्ष

प्रशासन के इस निर्णय को तीर्थ परंपरा के परिष्कार और वैदिक शिक्षा को सम्मान दिलाने का माध्यम माना जा रहा है। इस नवाचार से देश की गुरुकुल पाठशालाओं में वेदाध्ययन करने वाले वेदपाठी बटुकों के लिए उज्ज्वल भविष्य के द्वार खुल गए हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा स्थली उज्जयिनी, जो गुरु-शिष्य परंपरा की संवाहक रही है, साढ़े पाँच हज़ार सालों से वेद, व्याकरण और संस्कृति साहित्य के अध्ययन-अध्यापन का केंद्र रही है।

वर्तमान में भी उज्जयिनी की धर्मधरा से श्री महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, श्री महाकालेश्वर वैदिक प्रशिक्षण व शोध संस्थान तथा श्री महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्व विद्यालय के माध्यम से देशभर में बटुक वेदाध्ययन कर रहे हैं।

वेद, ज्योतिष, कर्मकांड और मंदिर प्रबंधन जैसे विषयों में उच्च शिक्षा की डिग्री प्राप्त करने के बाद इन विद्यार्थियों के भविष्य की राह आमतौर पर तीर्थों व मंदिरों तक जाती है। जहाँ वंश परंपरा के अनुसार व्यवस्थाएँ संचालित होती हैं, ऐसे में इन विद्यार्थियों को सहायक के रूप में कार्य करना पड़ता है।

मंदिर समिति ने शिप्रा तट पर शिप्रा आरती की शुरुआत कर परंपरा में परिष्कार और बटुकों के लिए स्वर्णिम भविष्य की संभावना के नए द्वार खोले हैं। उक्त संस्थानों में वेदाध्ययन कर चुके डिग्रीधारी बटुक तीर्थों तथा मंदिरों की धार्मिक व्यवस्था को और अधिक शास्त्रसम्मत व सशक्त बना सकते हैं।

देश के लिए 'रोल मॉडल' व्यवस्था

मंदिर समिति ने देश के प्रमुख तीर्थों व मंदिरों में पूजा-अर्चना की परंपरागत व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। शिप्रा के सभी प्रमुख घाटों पर वर्षों से चली आ रही शिप्रा आरती यथावत जारी है।

मंदिर समिति ने केवल एक घाट पर नई आरती शुरू की है, जिससे शिप्रा का वैभव बढ़ेगा। यह व्यवस्था देश के धर्मस्थलों पर ‘रोल मॉडल’ बनेगी और वेद अध्ययन कर रहे बटुकों को मंदिर तथा तीर्थों में सेवा, पूजा और अनुष्ठान के नए अवसर मिलेंगे।

पंडा समिति का विरोध

श्री क्षेत्र पंडा समिति के अध्यक्ष और तीर्थपुरोहित पं. राजेश त्रिवेदी आमवाला पंडा ने कहा कि महाकाल मंदिर समिति ने शिप्रा के घाट पर आरती की शुरुआत कर सनातन हिन्दू धर्म की प्राचीन परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया है।

उन्होंने बताया कि अनादिकाल से तीर्थों व मंदिरों की अपनी एक परंपरा व मर्यादा रही है, जहाँ की पूजा-अर्चना का अधिकार वंश परंपरा से तीर्थपुरोहितों व पुजारियों को प्राप्त है। इसमें हस्तक्षेप करने से यह पुरातन व्यवस्था भंग हो जाएगी और धार्मिक व्यवस्था का ताना-बाना टूट जाएगा।

पं. त्रिवेदी ने स्मरण कराया कि पुराने अधिकारी इस बात को समझते थे। वर्ष 2015 में महाकाल मंदिर समिति ने शिप्रा आरती की शुरुआत की थी और श्री क्षेत्र पंडा समिति के माध्यम से राणौजी की छत्री घाट पर तीर्थपुरोहित के माध्यम से ही इसकी शुरुआत हुई थी।

उन्होंने कहा कि अपने पंडितों को लाकर नई व्यवस्था शुरू करना प्राचीन परंपरा में हस्तक्षेप है, जिसका हम समस्त तीर्थपुरोहित विरोध करते हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि यदि मंदिर समिति तीर्थ और उसके पुरोहितों की परंपरा को खंडित करती है, तो पुरोहितों को महाकाल मंदिर में पूजन का अधिकार दिया जाए।

प्रशासन का स्पष्टीकरण

एसडीएम पवन बारिया ने बताया कि महाकाल प्रबंध समिति की ओर से एक नई शुरुआत की जा रही है। हरिद्वार में गंगा आरती की तर्ज पर उज्जैन में भी शिप्रा नदी के किनारे भव्य आरती शुरू करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी को हटाने या रोकने की बात नहीं है, बल्कि मंदिर समिति की ओर से आरती के स्वरूप में नवाचार किया जा रहा है।

एसडीएम एलएन गर्ग ने बताया कि प्रशासन ने पंडा समिति के पुरोहितों को महाकाल मंदिर समिति के बटुकों के साथ आरती में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था, ताकि दोनों मिलकर आरती कर सकें। हालांकि, पुरोहित इसके लिए तैयार नहीं हुए। प्रशासन के अनुसार, अब रोजाना शिप्रा आरती महाकाल मंदिर समिति की ओर से कराई जाएगी।