बुलंद सोच, भोपाल।
वर्ष 1857 में पूरे हिंदुस्तान में आजादी की पहली चिंगारी भड़क चुकी थी। इसी दौरान भोपाल रियासत की सैन्य छावनी सीहोर में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आग सुलग रही थी।
सिपाही बहादुर सरकार का गठन
6 अगस्त 1857 को रिसालदार वली शाह और कोठ हवलदार महावीर कोठ के नेतृत्व में सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका। सैनिकों ने अंग्रेजों का यूनियन जैक उतारकर उसकी जगह एक ही डंडे पर दो झंडे फहराए, जिनमें हरा ‘निशाने-मोहम्मदी’ और भगवा ‘महावीरी झंडा’ शामिल थे। नई क्रांतिकारी सरकार का नाम ‘सिपाही बहादुर सरकार’ रखा गया, जबकि सरकार चलाने के लिए ‘महावीर काउंसिल’ बनाई गई। वली शाह को सैन्य परिषद का प्रमुख बनाया गया, वहीं महावीर को नागरिक प्रशासन और अदालत की जिम्मेदारी सौंपी गई।
क्रांतिकारियों का अभियान
12 अगस्त को क्रांतिकारियों ने रिचपाल सिंह के बंगले पर हमला किया। 8 से 13 अगस्त के बीच अंग्रेजों की बैरकों और बंगलों को आग के हवाले कर दिया गया। 19 अगस्त तक कचहरी, सरकारी खजाना और जेल सहित लगभग पूरा सरकारी तंत्र क्रांतिकारियों के नियंत्रण में आ गया। इसके बाद 22 अगस्त 1857 को क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के पॉलिटिकल एजेंट के आवास पर हमला किया, जेल के दरवाजे तोड़कर कैदियों को आजाद कराया और सरकारी खजाने पर कब्जा कर लिया।
रानी लक्ष्मीबाई और नवाब सिकंदर बेगम
इसी दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने नवाब सिकंदर बेगम को दो बार पत्र लिखकर अंग्रेजों का साथ छोड़कर क्रांतिकारियों का समर्थन करने की अपील की। हालांकि, बेगम ने जवाब दिया कि वह अंग्रेजों का साथ देंगी। रानी लक्ष्मीबाई ने तीसरा संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘मैं अपनी मौजूदा मुहिम से निपटकर भोपाल आऊंगी और अपनी तलवार की नोक पर आपको अंग्रेजों की मदद करने से रोकने के लिए मजबूर कर दूंगी।’ सिकंदर बेगम ने भी उतनी ही स्पष्टता से जवाब दिया और लिखा कि ‘रियासत भोपाल को फख्र है कि वह हमेशा से बरतानवी हुकूमत की वफादार रही है। अगर आप मोर्चा जमाना चाहती हैं तो आइए, मेरा आतिशी तोपखाना आपका मुकाबला करने के लिए हर वक्त तैयार है।’
सीहोर में रक्तपात
मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी 1858 को अंग्रेज जनरल ह्यू रोज अपनी सेना के साथ सीहोर के सेकंडरी बाग पहुंचा। यहां क्रांतिकारियों को घेर लिया गया और कुछ देर में गोलियों की बौछार शुरू हो गई, जिसमें 356 क्रांतिकारी शहीद हो गए। भोपाल के इतिहास में इसे सबसे रक्तरंजित सामूहिक हत्याकांड माना जाता है। क्रांति के प्रमुख नेता वली शाह और महावीर कोठ को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके बाद 2 फरवरी 1858 को दोनों को फांसी दी गई।
संदर्भ
यह जानकारी शाहनवाज खान लिखित पुस्तक ‘सिपाही बहादुर’ से ली गई है, जिसे मध्य प्रदेश सरकार के स्वराज संस्थान संचालनालय ने प्रकाशित किया है।

