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2026-07-29

अमजद खान की ₹1.27 करोड़ बकाया फीस वसूलने अंडरवर्ल्ड ने की पेशकश, परिवार ने ठुकराई मदद

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

अमजद खान के पिता, जकारिया खान, जिनका फिल्मी नाम जयंत था, एक अभिनेता थे। जयंत ने शुरुआती पढ़ाई के बाद राजस्थान के अलवर में पुलिस अधिकारी की नौकरी शुरू की थी, जिसे बाद में फिल्मों में आने के लिए छोड़ दिया। निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ‘जयंत’ नाम दिया। उन्होंने 1930 और 1940 के दशक में कई फिल्मों में हीरो और बाद में कैरेक्टर एक्टर के रूप में काम किया, दिलीप कुमार, मधुबाला और किशोर कुमार जैसे सितारों के साथ भी अभिनय किया।
जयंत का निधन 2 जून 1975 को गले के कैंसर से हुआ, उनकी सबसे बड़ी सफलता, फिल्म ‘शोले’ के रिलीज होने से लगभग दो महीने पहले। अमजद खान भी अपने पिता की तरह फिल्मों में आए, लेकिन जयंत अपने बेटे की यह सफलता नहीं देख सके।
अमजद खान के बेटे के जन्म के समय परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। उस समय उनकी पत्नी को मैटरनिटी हॉस्पिटल से घर लाने के लिए उनके पास 300-400 रुपए भी नहीं थे। इसी दिन अमजद खान को फिल्म ‘शोले’ साइन करने का मौका मिला, जो बाद में उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बनी।

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‘शोले’ और गब्बर सिंह का किरदार

फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह का किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित किरदारों में से एक माना जाता है। निर्देशक रमेश सिप्पी ने इस भूमिका के लिए शुरुआत में डैनी डेंजोंगपा को कास्ट करने का विचार किया था, लेकिन फिरोज खान की फिल्म ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान जाने के कारण डैनी ने यह फिल्म छोड़ दी थी।
यह भूमिका बाद में अभिनेता रंजीत को भी ऑफर की गई थी, लेकिन उन्होंने डैनी की दोस्ती के कारण इसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद यह किरदार अमजद खान को मिला।
अमजद खान के बेटे शादाब खान के अनुसार, लेखक सलीम खान ने सबसे पहले निर्देशक रमेश सिप्पी से अमजद खान की सिफारिश की थी। इसी दौरान अभिनेता सत्येन कपूर ने भी रमेश सिप्पी से अमजद खान को मौका देने का आग्रह किया था।
सलीम खान और सत्येन कपूर की सिफारिश के बाद रमेश सिप्पी ने एक नाटक में अमजद खान की परफॉर्मेंस देखी, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें ऑडिशन के लिए बुलाया। ऑडिशन सफल रहा और अमजद खान को ‘शोले’ में गब्बर सिंह का किरदार मिल गया।
फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह की आवाज को लेकर शुरुआत में लेखक जोड़ी सलीम-जावेद को संदेह था और उन्होंने आवाज डब कराने का सुझाव दिया था। हालांकि, निर्देशक रमेश सिप्पी इस फैसले के पक्ष में नहीं थे।
रमेश सिप्पी का मानना था कि अमजद खान की अनूठी आवाज ही इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत है। अभिनेता अमिताभ बच्चन ने भी रमेश सिप्पी से अमजद खान की आवाज को न बदलने की सलाह दी थी, जिसके बाद उनकी असली आवाज को ही फिल्म में रखा गया, जो हिंदी सिनेमा की यादगार आवाजों में से एक बन गई।
फिल्म ‘शोले’ की शूटिंग एक साल से अधिक समय तक चली थी। इस दौरान रमेश सिप्पी अमजद खान के साथ मशहूर टैरो कार्ड रीडर डोलोरेस से मिलने गए थे। डोलोरेस ने टैरो कार्ड देखते ही कहा था कि फिल्म सुपरहिट होगी और पांच साल तक चलेगी, जिसकी वजह अमजद खान होंगे।
गब्बर सिंह का आइकॉनिक डायलॉग “अरे ओ सांभा, कितने आदमी थे?” अमजद खान को अपने घर के धोबी से प्रेरित होकर मिला था, जो लोगों को अनोखे अंदाज में “अरे ओ शांती.” कहकर आवाज लगाता था।

व्यक्तिगत जीवन और स्वास्थ्य चुनौतियाँ

एक पुराने साक्षात्कार में दिवंगत अभिनेता अमजद खान ने बताया था कि वह रोज 4-5 घंटे कसरत करते थे, बैडमिंटन खेलते थे और वेट उठाते थे। एक दुर्घटना में उनके शरीर की लगभग सभी हड्डियां टूट गईं और डॉक्टर ने तीन साल तक एक्सरसाइज से मना कर दिया।
इसके बाद उन्हें दूसरा हादसा झेलना पड़ा, जिसमें उनका पैर टूट गया, और फिर पैरालिसिस का अटैक आया, जिसके कारण उन्हें महीनों तक बिस्तर पर रहना पड़ा।
वर्ष 1976 में अमजद खान अपने परिवार के साथ फिल्म ‘द ग्रेट गैम्बलर’ की शूटिंग के लिए गोवा जा रहे थे। उनके बेटे शादाब खान के अनुसार, अमजद खान खुद कार चला रहे थे और पीछे उनकी पत्नी शैला खान, जो उस समय बेटी अहलम के साथ गर्भवती थीं, और शादाब बैठे थे।
सुबह के समय, रात की बारिश से सड़क गीली थी, तभी अचानक रास्ते में एक खराब ट्रक सामने आ गया। ट्रक से बचने के लिए अमजद खान ने तुरंत गाड़ी मोड़ी, लेकिन कार का संतुलन बिगड़ गया और वह एक पेड़ से जा टकराई। इस भयानक हादसे में अमजद खान की जान बची, उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गईं और शादाब की कॉलर बोन टूट गई। पूरे परिवार को तुरंत अस्पताल ले जाया गया।
हादसे की खबर मिलते ही अमिताभ बच्चन ने मुंबई से इलाज और अन्य आवश्यक इंतजाम किए थे।
वर्ष 1976 के भीषण सड़क हादसे के बाद अमजद खान अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे थे। उसी दौरान महान फिल्मकार सत्यजीत रे उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे और कहा कि वह ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में वाजिद अली शाह का किरदार उन्हीं से निभाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें मरना नहीं चाहिए। अमजद खान बाद में ठीक हुए और उन्होंने फिल्म में यह यादगार किरदार निभाया।
इस हादसे में अमजद खान की कई हड्डियां टूट गईं, फेफड़ा क्षतिग्रस्त हो गया और गर्दन में गंभीर चोट आई, जिसके कारण उन्हें लंबे समय तक सपोर्ट कॉलर पहनना पड़ा। वह करीब एक साल तक बिस्तर पर रहे और लगातार दवाइयों तथा आराम के कारण उनका वजन तेजी से बढ़ने लगा।
हादसे से पहले अमजद खान बेहद फिट थे और क्रिकेट व बैडमिंटन के शौकीन थे, लेकिन दुर्घटना के बाद उनके पैर में लगी रॉड लगभग 20 साल तक नहीं निकाली गई, जिससे वह पहले की तरह शारीरिक गतिविधियां नहीं कर सके और उनका स्वास्थ्य गिरने लगा।

निधन और उसके बाद

27 जुलाई 1992 की शाम को अमजद खान अपने कमरे में आराम कर रहे थे। शाम करीब 8 बजे उनके बेटे शादाब खान घर लौटे, तो उनकी मां ने बताया कि उनके पिता उठ नहीं रहे हैं। शादाब ने उन्हें उठाने की कोशिश की, लेकिन उनका शरीर ठंडा पड़ चुका था।
तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया, जिन्होंने जांच के बाद बताया कि अमजद खान को मैसिव हार्ट अटैक आया है और एक खास इंजेक्शन की आवश्यकता है। शादाब दवा लेने निकले, लेकिन जब वह इंजेक्शन लेकर लौटे, तो डॉक्टर ने कहा कि वह कुछ सेकंड देर से पहुंचे।
यह सुनते ही शादाब खान का गुस्सा और दर्द फूट पड़ा। उन्होंने डॉक्टर पर हाथ उठा दिया, घर का सामान तोड़ डाला और दीवार पर मुक्के मारे। शादाब ने बाद में स्वीकार किया कि 18 साल की उम्र में पिता को खोने के दर्द के कारण वह खुद पर काबू नहीं रख पाए थे।
अमजद खान के बेटे शादाब खान ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उनके पिता के निधन के कुछ महीने बाद उनके परिवार को अंडरवर्ल्ड से एक फोन आया था। अमजद खान की फिल्मों की लगभग ₹1.27 करोड़ फीस कई बड़े फिल्म निर्माताओं पर बकाया थी, जो परिवार को कभी वापस नहीं मिली थी।
शादाब के अनुसार, मिडिल ईस्ट से जुड़े एक गैंगस्टर ने उनकी मां को फोन कर कहा था कि वह यह पूरी रकम तीन दिनों के भीतर बॉलीवुड से वसूल कर उनके घर पहुंचा सकता है। हालांकि, उनकी मां ने यह प्रस्ताव तुरंत ठुकरा दिया और कहा कि उनके पति ने कभी अंडरवर्ल्ड की मदद नहीं ली, और वह उनके जाने के बाद भी ऐसी शुरुआत नहीं करना चाहतीं।