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2026-08-14

भोपाल: झुग्गी मुक्त अभियान पर ₹3,115 करोड़ खर्च, बस्तियों की संख्या 72 से बढ़कर 388 हुई

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

भोपाल को झुग्गी मुक्त बनाने के लिए पिछले 40 साल में लगभग 3,115 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद, लगभग 25 लाख की आबादी वाले शहर में 8 लाख से अधिक लोग झुग्गियों में रहने का अनुमान है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, पहले 72 झुग्गी बस्तियां थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर 388 हो गई है, जिसका अर्थ है कि लगभग हर तीसरा व्यक्ति झुग्गी में निवास कर रहा है।

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मास्टर प्लान की कमी

अर्बन प्लानिंग के जानकारों के मुताबिक, 21 साल से नया मास्टर प्लान न आना भी इस स्थिति का एक प्रमुख कारण है। यदि समय पर योजना आती, तो बढ़ती आबादी के अनुसार नए रहवासी क्षेत्र चिह्नित होते, जहां गरीब वर्ग के लिए भी मकान बनते और सस्ते वैध आवास के विकल्प बढ़ते।

पुनर्वास मॉडल की खामियां

पुनर्वास के मॉडल में भी कमियां रहीं। कई स्थानों पर मकान रोजगार के प्रमुख केंद्रों से दूर बनाए गए। इससे आने-जाने और रोजमर्रा का खर्च बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप कुछ परिवार पुराने इलाकों में लौट गए। इसके अतिरिक्त, कुछ आवंटित मकान किराए पर दे दिए गए या दानपत्र के माध्यम से दूसरों को सौंप दिए गए।

योजनाओं पर खर्च और प्रभावशीलता

पुराने झुग्गी पुनर्वास और उन्मूलन कार्यक्रमों पर लगभग 1,450 करोड़ रुपए खर्च हुए। प्रधानमंत्री आवास योजना के पूर्ण और निर्माणाधीन प्रोजेक्ट पर 1,664.70 करोड़ रुपए लगाए गए। इन योजनाओं की मुख्य कमी यह रही कि आवास निर्माण के साथ परिवारों को रोजगार से जोड़ने, उन्हें नए घरों में टिकाए रखने और खाली हुई जमीन पर दोबारा अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था उतनी प्रभावी नहीं रही। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल झुग्गियां हटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नई झुग्गियां बसने से रोकना भी आवश्यक है।

रोजगार और आवास का तालमेल

कई पुनर्वास कॉलोनियां शहर और रोजगार के प्रमुख केंद्रों से काफी दूर विकसित की गईं। दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, ठेला-रिक्शा चालक और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए रोज आना-जाना महंगा साबित हुआ। कई परिवारों की आजीविका ठेला, रिक्शा, कबाड़ या अन्य सामान पर निर्भर करती है, और बहुमंजिला मकानों में इन्हें रखने के लिए पर्याप्त जगह न होने से भी उन्हें परेशानी हुई। बिजली, पानी और रखरखाव का नियमित खर्च भी बढ़ गया। परिणामस्वरूप, कुछ परिवार आवंटित मकान छोड़कर रोजगार के नजदीक पुराने इलाकों में लौट गए। यह दर्शाता है कि यदि आवास की योजना रोजगार और परिवहन से नहीं जुड़ी होती है, तो पक्का मकान भी स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित नहीं कर पाता।

आवासों के भौतिक सत्यापन में अनियमितताएं

नगर निगम और जिला प्रशासन द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन में 650 आवासों में से 83 में गड़बड़ी पाई गई। इनमें से 68 मकानों में किरायेदार रह रहे थे, जबकि 15 मकान दानपत्र के जरिए दूसरे लोगों को दिए जाने की जानकारी सामने आई। नियमों के अनुसार, आवंटित मकान हितग्राही के स्वयं रहने के लिए होते हैं और इन्हें बेचने या किराए पर देने की अनुमति नहीं है।

अतिक्रमित प्राइम जमीन

भोपाल में 2 हजार एकड़ से अधिक प्राइम लोकेशन की जमीन पर झुग्गियां मौजूद हैं। इसमें सड़क, सार्वजनिक सुविधाओं और विकास परियोजनाओं के लिए आवश्यक जमीन भी शामिल है। अतिक्रमण के कारण इस जमीन का उपयोग शहर की जरूरतों के हिसाब से नहीं हो पा रहा है, जो मास्टर प्लान के लिए एक बड़ी चुनौती है। भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवश्यक जमीन पहले से ही घिरी हुई है।

भविष्य की योजनाएं

भोपाल कलेक्टर प्रियंक मिश्रा और नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन ने बताया है कि शहर को झुग्गी मुक्त करने के लिए नए प्रोजेक्ट तैयार किए गए हैं। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बन चुकी है और शासन स्तर पर बैठकें जारी हैं। मंजूरी और टेंडर की प्रक्रिया भी चल रही है। जहां जमीन की कमी है, वहां विकल्पों की तलाश की जा रही है।