बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले के जंगलों में लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पुराने मूंगा यानी प्रवाल जीवाश्म के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। यह खोज वर्तमान भूगोल से बिल्कुल भिन्न अतीत की कहानी प्रस्तुत करती है।
घड़े की आकृति में प्राप्त इन कठोर जीवाश्म संरचनाओं से यह संकेत मिलता है कि जिस भूभाग पर आज सघन वन हैं, उसके अतीत में समुद्री पर्यावरण उपस्थित रहा होगा। पृथ्वी का यह बदलता भूगोल उस वैज्ञानिक प्रमाण की ओर इशारा करता है, जिसे 20वीं सदी में अल्फ्रेड वेगनर ने ‘महाद्वीपीय विस्थापन’ के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया था। वेगनर ने कहा था कि आज जो महाद्वीप अलग-अलग दिखाई देते हैं, वे करोड़ों वर्ष पहले एक ही विशाल भूभाग थे, जो धीरे-धीरे खिसककर अपनी वर्तमान स्थिति में पहुँचे।
मध्य प्रदेश पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार के अधिकारियों ने डिंडौरी जिले के जंगलों में मंदिर जैसी एक संरचना देखी। देखने और छूने पर यह संरचना प्रवाल जीवाश्म जैसी प्रतीत हुई। इसके उपरांत, बेंगलुरु की जियोलॉजी लैब में इसकी जांच कराई गई, जिसने इसकी पुष्टि की।
यहां के बैगा आदिवासियों ने इन जीवाश्मों को एक के ऊपर एक रखकर खंभे जैसी आकृति का निर्माण किया है। वे इस स्थान पर ग्राम देवता की स्थापना कर वर्षों से पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
प्रवाल, जिसे मूंगा भी कहते हैं, समुद्र में रहने वाले बहुत छोटे जीवों द्वारा निर्मित एक कठोर संरचना है। ये जीव अपने शरीर के चारों ओर कैल्शियम कार्बोनेट का खोल बनाते हैं। करोड़ों वर्ष पुरानी प्रवाल संरचना जब चट्टान में सुरक्षित हो जाती है, तो उसे प्रवाल जीवाश्म (कोरल फॉसिल) कहा जाता है।
प्रदेश में समुद्री जीवाश्म इससे पहले धार, खरगोन, बैतूल, झाबुआ और उमरिया जैसे जिलों में भी मिल चुके हैं, किंतु कोरल जीवाश्म मिलने की बात पहली बार सामने आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र कभी समुद्र का हिस्सा रहा होगा।
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के आयुक्त मदन कुमार नागरगोजे के अनुसार, बैगा आदिवासियों द्वारा वहां जीवाश्म की आकृतियों को सजाकर पूजा स्थल बनाने का अर्थ यह भी है कि आदिवासी सदियों से प्रकृति की पूजा करते आ रहे हैं। उन्होंने यह भी संभावना व्यक्त की कि आदिवासियों को जीवाश्म का महत्व ज्ञात हो सकता है। नागरगोजे ने बताया कि डिंडौरी में कोरल जीवाश्म की घड़ेनुमा आकृतियां मिली हैं, जिन्हें बैगा आदिवासियों ने एक के ऊपर एक रखकर सुंदर आकृति बनाई है। यहां उन्होंने ग्राम देवता की स्थापना की है जिसकी वर्षों से पूजा की जा रही है। ये जीवाश्म लगभग साढ़े छह करोड़ वर्ष पुराने हैं और इस क्षेत्र में डायनासोर के जीवाश्म भी मिले हैं।
इन आकृतियों की पहचान डॉक्टर प्रियंका घोष ने की, जो स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ होने के साथ-साथ भूगोल और भूगर्भ शास्त्र (जियोलॉजी) में अध्ययन तथा दस्तावेजीकरण करती हैं। उन्होंने बैगा आदिवासियों के 52 गांवों के समूह ‘बैगाचक’ से लगे जंगल में इन घड़ेनुमा आकृतियों को देखा। उन्हें लगा कि यदि इस क्षेत्र में वनस्पतियों के जीवाश्म हो सकते हैं, तो समुद्री जीवों के भी होने चाहिए। इसके बाद पुरातत्व विभाग की टीम ने भी इसका निरीक्षण किया। जियोलॉजी लैब में परीक्षण के बाद इसके 6.5 करोड़ वर्ष पुराने कोरल जीवाश्म होने की पुष्टि हुई। इस समय को लगभग वही काल माना जाता है जब डायनासोर का युग समाप्त हो रहा था।

