बुलंद सोच, रांची।
झारखंड की राजधानी रांची स्थित जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में हजारों छात्रों की भीड़ के बीच सबसे प्रमुख आवाज उन युवाओं की है, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी सरकारी नौकरी के सपने को समर्पित कर दी है।
इन छात्रों की आंखों में अब केवल नौकरी का सपना नहीं, बल्कि न्याय की मांग है। उनका कहना है कि यदि भर्ती परीक्षाएं ही निष्पक्ष नहीं होंगी, तो मेहनत करने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।
कई छात्र पिछले 12 वर्षों से लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, वहीं कुछ उम्र सीमा खत्म होने के डर से हर दिन परेशान हैं।
आर्थिक संकट और रद्द हुई नियुक्तियां
आरती पांडेय ने बताया कि उनके पिता एक गैस एजेंसी में कार्यरत हैं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि घर में किसी के बीमार पड़ने पर इलाज के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। उनका चयन लेडी सुपरवाइजर के पद पर हो गया था, लेकिन बाद में उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई।
आंदोलन में शामिल रवि महतो भावुक होकर कहते हैं कि उनकी मां ने उनकी पढ़ाई के लिए अपना मंगलसूत्र बेच दिया था। उनके घर वालों ने खेत गिरवी रखे और कर्ज लिया, ताकि वह पढ़ सकें।
श्री महतो ने सवाल किया कि यदि नौकरियां केवल पैसे वालों को ही मिलनी थीं, तो उन्हें इतने साल पढ़ने के लिए क्यों कहा गया? उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सरकार से नौकरी नहीं मांग रहे, बल्कि केवल निष्पक्ष परीक्षा और न्याय की मांग कर रहे हैं।
उम्र सीमा खत्म होने का डर
बोकारो से आए प्रदीप ने बताया कि वह पिछले 12 वर्षों से लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
श्री प्रदीप का कहना है कि हर बार नई उम्मीद के साथ तैयारी करते हैं और हर बार किसी न किसी विवाद की खबर आ जाती है। उन्हें डर लगने लगा है कि कहीं उनकी उम्र सीमा ही खत्म न हो जाए।

