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2026-07-29

मध्य प्रदेश में हर 12वां व्यक्ति हेपेटाइटिस संक्रमित, गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश में हेपेटाइटिस बी और सी तेजी से गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन रहे हैं। प्रदेश का हर 12वां व्यक्ति इन संक्रमणों से प्रभावित है। बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक अपनी बीमारी का पता ही नहीं चलता। हमीदिया अस्पताल के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश टिक्कस ने विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर कहा कि हेपेटाइटिस का पता अक्सर तब चलता है, जब लिवर काफी हद तक खराब हो चुका होता है। यही कारण है कि इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।

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लिवर को धीरे-धीरे नुकसान और देर से पहचान

डॉ. टिक्कस के अनुसार, हेपेटाइटिस बी और सी वायरस धीरे-धीरे लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं। लगभग 95 प्रतिशत मरीजों में शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। जब तक पीलिया, अत्यधिक कमजोरी, भूख कम लगना या पेट में पानी भरने जैसी समस्याएं सामने आती हैं, तब तक कई मामलों में बीमारी लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर तक पहुंच चुकी होती है।

टीकाकरण की स्थिति और संक्रमण का आंकड़ा

हेपेटाइटिस की रोकथाम में टीकाकरण सबसे प्रभावी उपाय है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4) के अनुसार, मध्य प्रदेश में 12 से 23 माह के 81.5 प्रतिशत बच्चों का ही हेपेटाइटिस बी टीकाकरण पूरा हो सका है। यानी प्रदेश का लगभग हर पांचवां बच्चा अभी भी इस गंभीर संक्रमण के जोखिम में है। भोपाल में 43 प्रतिशत बच्चे टीके से वंचित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्लड बैंकों में होने वाली नियमित जांच भी संक्रमण की गंभीरता का संकेत दे रही है। भोपाल के सरकारी ब्लड बैंक में अब तक 3,900 हेपेटाइटिस बी और 390 हेपेटाइटिस सी संक्रमितों की पहचान की जा चुकी है। यह केवल उन लोगों का आंकड़ा है जिनकी जांच हुई है, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है।

संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण

जेपी अस्पताल के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. पीयूष पंचरत्न और अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी के फैलने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें समय पर जांच नहीं कराना, नवजात शिशुओं का टीकाकरण छूट जाना, संक्रमित सुई का उपयोग, बिना जांचा गया रक्त चढ़ाना, दंत चिकित्सा उपकरणों का ठीक से स्टरलाइज न होना तथा असुरक्षित तरीके से टैटू बनवाना प्रमुख हैं।

बचाव और उपचार के तरीके

हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए उपलब्ध टीका अत्यंत प्रभावी है। यदि जन्म के 24 घंटे के भीतर नवजात को हेपेटाइटिस बी की बर्थ डोज दे दी जाए तो संक्रमण का खतरा लगभग 90 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। वहीं, हेपेटाइटिस सी का इलाज अब आधुनिक दवाओं से तीन से छह महीने में संभव है, बशर्ते संक्रमण की समय रहते पहचान हो जाए।