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2026-08-06

मुरैना: पहाड़गढ़ के जंगल में तेंदुए का हमला, चरवाहा गंभीर घायल; मंदिर में चार घंटे तक रहा आतंक

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, मुरैना।

पहाड़गढ़ के ईश्वरा महादेव जंगल में एक तेंदुए ने हमला किया। तेंदुए ने सबसे पहले खिरकाई पर मवेशियों की रखवाली कर रहे चरवाहे पर हमला कर उसे मरणासन्न कर दिया।
यह घटना सोमवार की देर रात 11 बजे ईश्वरा महादेव मंदिर से एक किलोमीटर दूर स्वाही की टेक गांव के ग्रामीणों की खिरकाई पर हुई। खिरकाई पर मौजूद स्हायी की टेक निवासी 53 वर्षीय केशव पुत्र शंकर गुर्जर पर तेंदुए ने हमला किया।
तेंदुए के हमले में केशव के चेहरे, गर्दन, पीठ, हाथ और सीने पर गहरे घाव हो गए, जिससे वह लहूलुहान हो गया। खिरकाई से बचाओ-बचाओ की आवाज सुनकर मंदिर पर मौजूद साधू और मंदिर के ऊपर दुकानों के पास विश्राम कर रहे पदयात्री खिरकाई पर पहुंचे, जहां उन्हें लहूलुहान केशव मिला। तब तक तेंदुआ वहां से चला गया था।

मंदिर परिसर में दहशत का माहौल

रात साढ़े 11 बजे के करीब घायल चरवाहे केशव को लोग मंदिर पर लेकर आ गए। कुछ ही मिनटों में तेंदुआ भी दहाड़ते हुए वहां आ गया।
रात 12 बजे से तड़के चार बजे तक तेंदुआ मंदिर परिसर और उसके आसपास टहलता रहा। इस दौरान पुजारी या अन्य लोग टार्च का उजाला कर उसकी ओर देखते तो तेंदुआ दहाड़ने लगता था।
खूंखार तेंदुए के डर से पुजारी सहित करीब एक दर्जन लोगों ने खुद को एक हॉल में बंद कर दिया, इसी हॉल में घायल चरवाहा केशव कराहता रहा। मंदिर पर मोबाइल नेटवर्क नहीं होने के कारण मदद के लिए फोन भी नहीं लग सके।

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बचाव कार्य और पृष्ठभूमि

सुबह चार बजे तेंदुआ चला गया, तब पुलिस को खबर की गई, कुछ ही देर में पहाड़गढ़ थाने की टीम पहुंची। इसके बाद घायल को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसकी हालत नाजुक बनी हुई है।
सूचना के बाद वन विभाग और पुलिस की टीमें मंदिर के आसपास सर्चिंग कर तेंदुए का पता लगा रही हैं। कुछ लोगों ने इसे बाघ भी बताया है।
तेंदुए ने वह फर्श फाड़ दिया, जिसे चार दिन पहले पहाड़गढ़ थाना प्रभारी ने मंदिर परिसर में बिछवाया था।
गौरतलब है कि कूनो में चीते आने के बाद वहां से खदेड़े गए दर्जनों तेंदुए पहाड़गढ़ से लेकर धोविनी और गसवानी तक के जंगलों में विचरण कर रहे हैं। इन तेंदुओं ने कई बार ग्रामीण और चरवाहों पर हमला किया है।
इन दिनों पूरा जंगल हरा है और बरसात के इस सीजन में ग्रामीण अपनी मवेशियों को लेकर जंगलों में निवास करने लगते हैं। मवेशियों के लिए बनाए गए बाड़े को ग्रामीण खिरकाई बोलते हैं, जहां मवेशियों के साथ कुछ ग्रामीण रखवाली व चराने के लिए रहते हैं।